मगध विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान में राष्ट्र की अवधारणा पर राष्ट्रीय सम्मेलन
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
गया। मगध विश्वविद्यालय, बोधगया में शनिवार को “सामाजिक विज्ञान में राष्ट्र की अवधारणा: एक भारतीय परिप्रेक्ष्य” विषय पर 8वें वार्षिक राष्ट्रीय समाज विज्ञान परिषद (आरएसवीपी) राष्ट्रीय सम्मेलन–2026 के प्रथम दिवस का आयोजन किया गया। सम्मेलन सामाजिक विज्ञान के संदर्भ में राष्ट्र की भारतीय अवधारणा पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन, कुलगीत और स्वागत गीत से हुई।
सम्मेलन में बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में मगध विश्वविद्यालय के कुलपति एस. पी. शाही, केंद्रीय विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार के कुलपति के. एन. सिंह, राष्ट्रीय समाज विज्ञान परिषद के अध्यक्ष प्रकाशमणि त्रिपाठी, परिषद के संरक्षक पी. वी. कृष्ण भट्ट, राजकुमार भाटिया तथा संत महंत विवेकानंद गिरी शामिल रहे। इस अवसर पर सम्मेलन की स्मारिका और राष्ट्रीय समाज विज्ञान परिषद के जर्नल का विमोचन भी किया गया।
उद्घाटन सत्र में कुलपति एस. पी. शाही ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि सामाजिक विज्ञान के अध्ययन में राष्ट्र की अवधारणा को भारतीय ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भों में समझना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय बौद्धिक परंपरा को केंद्र में लाने पर बल दिया। केंद्रीय विश्वविद्यालय दक्षिण बिहार के कुलपति के. एन. सिंह ने इक्कीसवीं सदी के बदलते वैश्विक परिदृश्य की चर्चा करते हुए कहा कि इन चुनौतियों का समाधान सशक्त समाजविज्ञान के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने राष्ट्र को एक जैविक और सजीव इकाई बताते हुए सामाजिक चेतना की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। पी. वी. कृष्ण भट्ट ने कहा कि सामाजिक विज्ञान के विषयों में पश्चिमी चिंतकों के विचारों की प्रधानता दिखाई देती है, जिसके कारण भारतीय परंपरा और स्वदेशी चिंतन को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता बताई।
मुख्य अतिथि प्रेम कुमार ने अपने संबोधन में शिक्षा, राष्ट्रीय मूल्यों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में शिक्षा की भूमिका निर्णायक है तथा भारतीय राष्ट्र की संकल्पना व्यापक, समावेशी और गहन है, जो पश्चिमी अवधारणा से भिन्न है। सम्मेलन का मुख्य वक्तव्य चंद्रकला पाड़िया ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी विचारों में राष्ट्र को राजनीतिक संरचना माना जाता है, जबकि स्वामी विवेकानंद और अरविंद घोष के अनुसार भारतीय राष्ट्र आध्यात्मिकता, संस्कृति और सनातन धर्म में निहित चेतना है। अध्यक्षीय संबोधन में प्रकाशमणि त्रिपाठी ने कहा कि राष्ट्र अस्मिता और सम्मान से जुड़ा होता है तथा ऋग्वेद से लेकर अन्य ग्रंथों में इसकी अवधारणा मिलती है, जहां लोकमत को सर्वोच्च माना गया है।
सम्मेलन में महासचिव अमरजीव लोचन, आयोजन सचिव शमशाद अंसारी और विभागाध्यक्ष अंजनी कुमार घोष उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन दीपशिखा और दिव्या मिश्रा ने किया। अंत में कुलसचिव द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। इसके बाद द्वितीय सत्र में प्लेनरी सत्र और विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।