नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
मुजफ्फरपुर। शहर और ग्रामीण इलाकों में अचानक बढ़े जानवरों के हमलों के बाद सदर अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने मिसाल पेश की है। दशहरे के त्योहार के बाद जहां शहर में खुशियां होनी चाहिए थीं, वहां दहशत का माहौल है। पिछले तीन दिनों में आवारा कुत्तों ने 300 से अधिक मासूमों, बुजुर्गों और महिलाओं को अपना शिकार बना लिया। यह आंकड़ा साबित करता है कि नगर निगम और प्रशासन का आवारा जानवरों पर कोई नियंत्रण नहीं है। जब सदर अस्पताल में बुधवार को अकेले 227 लोग एंटी-रेबीज वैक्सीन के लिए कतारों में बिलख रहे थे, तब जिम्मेदार अधिकारी नदारद थे। पारू और मझौलिया जैसे ग्रामीण इलाकों से आए मरीजों को एक सुई के लिए ढाई घंटे तक धक्के खाने पड़े। रूपेश और विक्रम जैसे कई लोग, जिन्हें अपनों के ही पालतू जानवरों ने जख्मी कर दिया, घंटों दर्द से तड़पते हुए लाइन में खड़े रहे। सुरक्षाकर्मियों और मरीजों के बीच का तनाव असल में व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि दर्द और बेबसी का गुबार था। हर महीने औसतन 1100 लोग जानवरों के हमले का शिकार हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन की नींद तब तक नहीं खुलती जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए। आखिर इन बेगुनाह नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
डॉक्टरों ने इस संकट के बीच नागरिकों को जागरूक करते हुए कहा है कि पैनिक (घबराने) होने की जरूरत नहीं है। यदि कोई जानवर काट ले, तो तुरंत घाव को बहते पानी और साबुन से साफ करें। समय पर टीका लगवाना ही रेबीज से बचने का एकमात्र और अचूक उपाय है।