बेताब अहमद
सासाराम। अगर इरादे फौलादी हों, तो लाल गलियारा भी सफलता के लाल कालीन में बदल जाता है। रोहतास की सीमा कुमारी ने इस बात को सच कर दिखाया है। 2011 तक जिस इलाके में गोलियों की गूंज थी, वहां आज सीमा की सफलता का शंखनाद हो रहा है। एक ऐसा परिवार जहां पिता का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था और मजदूरी ही जीने का एकमात्र सहारा थी, वहां से निकलकर बीपीएससी (70वीं) में 1036वीं रैंक लाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। सरकारी स्कूल से शुरुआत, फिर इंजीनियरिंग, उसके बाद बिहार पुलिस में दारोगा पद पर चयन और अब बीपीएससी क्रैक करना। यह साबित करता है कि सीमा रुकने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास रचने के लिए बनी हैं। उन्होंने सुप्रिया आनंद की सफलता से जो चिंगारी ली थी, आज उसे एक मशाल बना दिया है।
बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में रोहतास प्रखंड के रसूलपुर गांव की सीमा कुमारी ने 1036वीं रैंक हासिल की है। सीमा का चयन प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के पद पर हुआ है। पूर्व में नक्सल प्रभावित रहे नौहट्टा क्षेत्र की रहने वाली सीमा कुमारी का शैक्षणिक सफर बेहद अनुकरणीय रहा है। उन्होंने वर्ष 2015 में मैट्रिक और 2017 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने छपरा के लोक नायक जयप्रकाश नारायण इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से ईईई (EEE) ट्रेड में बीटेक की डिग्री ली। वर्ष 2024 में उनका चयन बिहार पुलिस में दारोगा के पद पर भी हुआ था, जहां वे वर्तमान में बिपार्ड (पटना) में प्रशिक्षण ले रही हैं। उनकी इस सफलता पर उनके माता-पिता और क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने हर्ष व्यक्त किया है।
यह कहानी केवल एक परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि खौफ के साये में दम तोड़ते सपनों को दोबारा जिंदा करने की है। रोहतास का वह नौहट्टा प्रखंड, जो कभी लाल आतंक के खौफ से थर्राता था और जहां बेटियों के कदम चौखट के बाहर नहीं निकलते थे, आज वहां उम्मीद का एक नया सूरज उगा है। रसूलपुर गांव की सीमा कुमारी ने अभावों के उस चक्रव्यूह को तोड़ा है, जिसने न जाने कितनी प्रतिभाओं को निगल लिया। पिता धर्मेंद्र सिंह की रीढ़ की हड्डी टूटी, तो परिवार की आर्थिक रीढ़ भी हिल गई। पर सीमा का हौसला नहीं टूटा। टूटी झोपड़ी और सीमित किताबों के बीच, उसने अपनी तकदीर खुद लिखी। बीटेक से दारोगा और अब प्रखंड कल्याण पदाधिकारी तक का यह सफर एक मजदूर पिता के आंसुओं और एक बेटी के अडिग विश्वास की साझी जीत है। आज सीमा रोहतास की हर उस सिसकती आंख के लिए एक ढांढस है, जो गरीबी में भी आसमान छूना चाहती है।