बंगाल से आई थी पहली प्रतिमा: डेहरी में सांस्कृतिक मेल-मिलाप के साथ परवान चढ़ी दुर्गापूजा
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
डेहरी ऑन सोन। पाली रोड स्थित ऐतिहासिक श्री श्री रामकृष्ण आश्रम में इस वर्ष मां दुर्गा की आराधना का 99वां गौरवशाली अध्याय शुरू हो गया है। शक्ति, भक्ति और बंगाली संस्कृति की जीवंत परंपरा को संजोए इस पावन स्थल पर शुक्रवार की शाम बोधन, आमंत्रण और अधिवास के साथ महाउत्सव का आगाज़ हुआ। आश्रम परिसर में स्थित प्राचीन बेल वृक्ष के नीचे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां दुर्गा का आह्वान किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। परंपरा के अनुसार शनिवार को सप्तमी के पावन अवसर पर नौ प्रकार के पौधों (नवपत्रिका) को आश्रम से शोभायात्रा के रूप में एनिकट स्थित सोन नदी के तट पर ले जाया गया। वहां पवित्र जल से स्नान और श्रृंगार कराने के बाद, नवपत्रिका को सोन नदी के जल से भरे मिट्टी के घड़े के साथ मां की प्रतिमा के समीप स्थापित किया गया।
इस अनुष्ठान (नवपत्रिका प्रवेश) के साथ ही सप्तमी की विशेष पूजा संपन्न हुई और मां की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा की गई। लगभग एक सदी पुरानी इस विरासत को देखने और इसमें भाग लेने के लिए आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। शारदीय नवरात्र में अष्टमी और नवमी के पावन मिलन के उस दिव्य 48 मिनट (संधि काल) का इंतज़ार हर भक्त की आंखें बिछाए होती हैं। मां चामुंडा के इस परम शक्तिशाली पल में जब 108 कमल के फूलों और दीपों की रोशनी से मां की आराधना होती है, तो पूरा वातावरण भक्ति-रस से सराबोर हो उठता है। इसके बाद विजयादशमी पर सिंदूर खेला की सुमधुर परंपरा और मां को नम आंखों से दी जाने वाली विदाई, श्रद्धालुओं के दिलों को प्रेम और यादों से भर देती है। भक्ति के इस उमंग के बाद, दशमी के दिन सिंदूर की होली और ‘अपराजिता बंधन’ यह संदेश दे जाता है कि आस्था सिर्फ पूजा नहीं, अपितु अपनों को गले लगाने का पर्व है।
सोन नदी के तट पर बसे डेहरी शहर में दुर्गापूजा का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। वर्ष 1927 में बंगाली समुदाय की संस्था ‘सोन क्लब’ द्वारा बारह पत्थर मोहल्ले में पहली बार बंगाल से मंगाई गई मिट्टी की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। समय के साथ यह पूजा स्थल ट्रैफिक ट्रेनिंग स्कूल और सेन बिल्डिंग से होते हुए वर्ष 1962 में श्री श्री रामकृष्ण आश्रम (पाली रोड) पहुंची। आज यह स्थान डेहरी की साझी संस्कृति और गहरी आस्था का प्रतीक बन चुका है। आजादी से पहले, कलकत्ता और दिल्ली के बीच बसे डेहरी की खूबसूरती से आकर्षित होकर बंगाली समुदाय ने यहाँ अपना आशियाना बनाया था।
अपनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिए उन्होंने 1923 में काली पूजा और 1927 में दुर्गापूजा की नींव रखी। अभावों और बदलते ठिकानों (तार बंगला से लेकर रामकृष्ण आश्रम तक) के बावजूद, माँ की आराधना की यह लौ यहाँ के प्रवासियों और स्थानीय लोगों के आपसी भाईचारे से आज भी रोशन है। तार बंगला से शुरू हुआ यह सफर कभी ‘ट्रैफिक ट्रेनिंग स्कूल’ की पेट्रोमैक्स रोशनी में चमका, तो कभी ‘सेन बिल्डिंग’ तक पहुंचा। साल 1962 में ‘सोन क्लब’ का श्री श्री रामकृष्ण आश्रम में विलय हुआ और मां की यह आराधना वहीं बस गई। आज भी पाली रोड स्थित यह आश्रम डेहरी की आस्था और सदभाव का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।