नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
मुजफ्फरपुर। शिक्षा के मंदिरों में जब रखवाले ही शोषक बन जाएं, तो एक मासूम छात्र-छात्रा का घुट-घुट कर जीना लाजिमी हो जाता है। मुजफ्फरपुर स्थित एसकेएमसीएच के जीएनएम कॉलेज में कुछ ऐसा ही दर्दनाक वाकया सामने आया है, जहां व्यवस्था की कथित क्रूरता और छह महीने की मानसिक घुटन से तंग आकर एक होनहार छात्रा ने मौत को गले लगाने की कोशिश की।
रोते हुए कहा था- “अब नहीं रह पाऊंगी पापा”
नालंदा की रहने वाली यह छात्रा एसकेएमसीएच के हॉस्टल में रहकर जीएनएम सेकंड ईयर की पढ़ाई कर रही थी। शुक्रवार का दिन उसके लिए काल बनकर आया। जिंदगी और मौत के बीच आईसीयू में संघर्ष कर रही इस बेटी ने अपनी रूह कंपा देने वाली आखिरी बात रोते हुए अपने पिता से कही थी “पापा, मुझे बहुत परेशान किया जा रहा है, अब मैं और नहीं रह पाऊंगी।” इसके कुछ ही देर बाद सहपाठियों ने परिजनों को उसकी हालत बिगड़ने की सूचना दी, जिसके बाद परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई।

छह महीने का काला साया और वॉर्डन की मनमानी
नालंदा जिले की रहने वाली इस पीड़ित छात्रा के पिता, संजय कुमार का आरोप है कि हॉस्टल की वॉर्डन पिछले छह महीनों से उनकी बेटी को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही थी। मामूली बातों पर जबरन अटेंडेंस काट देना और छात्रा को हर कदम पर नीचा दिखाना वॉर्डन की आदत बन चुकी थी। परिजनों का यह भी दर्द है कि उन्होंने कुछ महीने पहले कॉलेज प्रशासन के सामने गुहार लगाई थी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे ‘मामूली बात’ समझकर नजरअंदाज कर दिया। अगर प्रशासन ने समय रहते एक्शन लिया होता, तो आज इस बेटी को आईसीयू के वेंटिलेटर पर जिंदगी की भीख न मांगनी पड़ती।

छात्रों में उबाल, प्रशासन की लीपापोती?
घटना के बाद पूरे कॉलेज परिसर में भारी आक्रोश और सनसनी फैल गई है। छात्र-छात्राएं गुस्से में हैं और हॉस्टल वॉर्डन को तुरंत बर्खास्त कर उस पर कानूनी शिकंजा कसने की मांग कर रहे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद जीएनएम कॉलेज के प्रिंसिपल ने हमेशा की तरह पारंपरिक बयान देते हुए कहा है कि प्रकरण संज्ञान में है और एक ‘जांच कमेटी’ का गठन किया जाएगा। हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब पहले ही वॉर्डन के खिलाफ शिकायत दी गई थी, तब कॉलेज प्रशासन कुंभकर्णी नींद में क्यों सोया रहा?
पीड़ित पिता अब न्याय के लिए एसकेएमसीएच ओपी थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं। फिलहाल, बेटी जिंदगी और मौत के बीच आईसीयू में संघर्ष कर रही है, और पूरा परिवार व कॉलेज प्रशासन की उस कथित ‘जांच रिपोर्ट’ का इंतजार कर रहा है जो शायद कागजों तक ही सीमित न रह जाए। सवाल यह उठता है कि क्या हर बार किसी मासूम के जान जोखिम में डालने के बाद ही प्रशासन की नींद क्यों खुलती है? फिलहाल, डॉक्टर छात्रा की जान बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं, और एक पिता न्याय के लिए थाने की चौखट पर खड़ा इंसाफ का इंतजार कर रहा है।