1953 में राजस्थान से मंगाए गए काले संगमरमर से बनी मां काली की प्रतिमा, बंगाल की साध्वी की साधना से भी जुड़ी है मंदिर की कथा
शशि तुलस्यान
मसौढ़ी। नवरात्र के पावन अवसर पर मसौढ़ी की धरती भक्तिमय हो उठी है। मां दुर्गा की आराधना के बीच स्टेशन रोड स्थित मां काली मंदिर में भी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। यह मंदिर क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। स्थानीय लोग मां काली को त्रिपुरा सुंदरी और नगर रक्षिका के नाम से भी पुकारते हैं। मान्यता है कि मां अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और नगर की रक्षा करती हैं। प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को मंदिर में भजन-कीर्तन और विशेष आरती का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
मंदिर ट्रस्ट के सदस्य रविशंकर प्रसाद के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। पहले यहां एक विशाल वृक्ष के नीचे मिट्टी की पिंडी बनाकर मां काली की पूजा-अर्चना की जाती थी। वर्ष 1953 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। इस दौरान राजस्थान से विशेष रूप से काला संगमरमर मंगाया गया, जिससे मां काली की भव्य प्रतिमा का निर्माण हुआ। प्रतिमा की स्थापना के बाद मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी और यह श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित कथा बंगाल से आई एक साध्वी की साधना का उल्लेख करती है। कहा जाता है कि साध्वी ने सबसे पहले यहां मां काली की आराधना शुरू की थी। उनका रहन-सहन देखकर स्थानीय लोग उन्हें साधारण महिला समझते थे। एक रात एक ग्रामीण ने उन्हें खेचरी मुद्रा में साधना करते देखा। इसके बाद लोगों को उनकी आध्यात्मिक साधना के बारे में जानकारी मिली। मान्यता है कि वह मां काली की अनन्य उपासक थीं।
मंदिर के ठीक सामने स्थित विशाल तालाब का इतिहास भी मां काली की उपासना से जुड़ा हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, गया के टेकारी महाराज ने अपनी रानी राजरूप कुंवर के आग्रह पर इस तालाब का निर्माण कराया था। रानी मां काली की परम भक्त थीं। कहा जाता है कि वह तालाब में स्नान करने से पहले मिट्टी की पिंडी बनाती थीं और स्नान के बाद उसकी पूजा करती थीं।
रानी के स्नान करने के कारण पहले इस तालाब को राजारानी तालाब कहा जाता था। बाद में मां काली के प्रति लोगों की आस्था बढ़ने के साथ यह कालीघाट के नाम से प्रसिद्ध हो गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1908 के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना और मां काली के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था का विस्तार होता गया।
मंदिर में मिट्टी की पिंडी के माध्यम से पूजा किए जाने के दौर में बनारस की एक भैरवी साध्वी यहां आराधना करती थीं। बाद में बनारस वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध महंत भी यहां पूजा-अर्चना करते थे। इन धार्मिक परंपराओं और प्रचलित कथाओं ने मंदिर की पहचान को और मजबूत किया है।
नवरात्र के दौरान मां काली मंदिर में श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ जाता है। भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि और नगर की खुशहाली की कामना करते हैं। आस्था, परंपरा और ऐतिहासिक मान्यताओं से जुड़ा यह मंदिर आज भी मसौढ़ी की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।