स्वप्न से संकल्प तक: समस्तीपुर की मधुमाला देवी की अनोखी तपस्या, देखने उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
समस्तीपुर। बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा स्थित चौरसिया टोला में मधुमाला देवी द्वारा 2,516 नुकीली कीलों की सेज पर लेटकर और सीने पर कलश रखकर मां दुर्गा की कठिन तपस्या करने की यह खबर एक अनोखा मामला सामने आया है। लगभग 35 वर्षीय मधुमाला देवी ने घर में बने मंदिर के समक्ष 2,516 कीलों से तैयार किए गए विशेष बेड पर लेटकर साधना शुरू की है। उनके पति रंजीत चौरसिया और परिवार के सहयोग से यह अनुष्ठान चल रहा है, जिसे देखने के लिए स्थानीय लोगों की भीड़ उमड़ रही है।
लोगों की आस्था के आगे कई बार तर्क पीछे छूट जाते हैं। जहां गृहिणी मधुमाला देवी परिवार और समाज की सुख-समृद्धि के लिए कांटों कीलों की सेज पर लेटी हुई हैं। मधुरता और भक्ति से भरे माहौल में लोग उनकी इस सहनशक्ति को देखकर हैरान हैं। कोई इसे मां की असीम कृपा मान रहा है, तो कोई इसे दृढ़ संकल्प का अद्भुत उदाहरण बता रहा है। मधुमाला देवी नामक महिला 32 किलो वजनी करीब 2,516 कीलों के बिस्तर पर लेटकर मां दुर्गा की आराधना कर रही हैं। उनके सीने पर कलश और पास में त्रिशूल स्थापित है। उनका दावा है कि उन्हें सपने में मिले आदेश के बाद उन्होंने यह 9 दिवसीय कठिन संकल्प लिया है।
मधुमाला का दावा है कि इसके बाद उन्हें कीलों पर लेटकर सीने पर कलश स्थापित कर आराधना करने का संदेश मिला। इसी अनुभव और अपनी आस्था से प्रेरित होकर उन्होंने कठिन साधना करने का संकल्प लिया। मधुमाला इस वर्ष अपने घर में बने माता के मंदिर के सामने सैकड़ों नुकीली कीलों पर लेटकर सीने पर कलश स्थापित किए हुए हैं। उनका विश्वास है कि मां दुर्गा की कृपा से उनके और उनके परिवार का कल्याण होगा। इसी आस्था के साथ वह नवरात्र के नौ दिनों तक निर्जला व्रत रखकर पूजा-अर्चना करने का संकल्प निभा रही हैं। उनकी साधना आसपास के लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। श्रद्धालु उन्हें देखने पहुंच रहे हैं और मां दुर्गा के जयकारे लगाकर अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहे हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में पूजा-अर्चना और जयघोष से भक्तिमय माहौल बना हुआ है।
आस्था अपनी जगह है, लेकिन चिकित्सक इसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बताते हैं। लगातार नौ दिनों तक बिना पानी निर्जला और नुकीली कीलों पर शरीर के दबाव से डिहाइड्रेशन, त्वचा पर गंभीर संक्रमण या आंतरिक चोट का खतरा बना रहता है। अंधविश्वास और परंपरा के बीच यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि श्रद्धा के नाम पर शरीर को इस हद तक कष्ट देना कहां तक उचित है। आस्था के नाम पर की जाने वाली ऐसी कठिन तपस्याएं अक्सर शरीर के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं। हालांकि, परिवार और स्थानीय लोगों की इस आस्था के बीच डॉक्टरों और समाज-विज्ञानियों द्वारा शारीरिक सुरक्षा का ध्यान रखने पर जोर दिया जा रहा है।