रेलवे की वेटिंग लिस्ट को ठेंगा! यात्री ने चलती ट्रेन में लगा लिया अपना ‘पर्सनल कुर्सी’
बेताब अहमद
मुजफ्फरपुर। हर साल त्योहारों के सीजन में दिल्ली, मुंबई और सूरत से बिहार लौटने वाले कामगारों की गरिमा दांव पर लग जाती है। मुजफ्फरपुर जंक्शन पर मुंबई-रक्सौल अंत्योदय एक्सप्रेस (15268) से सामने आई एक तस्वीर रेलवे के तमाम पूजा स्पेशल ट्रेनों के दावों को आईना दिखा रही है। त्योहार का सीजन आते ही परदेस में बैठे हर बिहारी का दिल घर भागने को बेकरार हो जाता है। इसी बेकरारी और मजबूरी की एक अनूठी कहानी मुजफ्फरपुर जंक्शन पर देखने को मिली। मुंबई में काम करने वाले विक्रम को जब रक्सौल आने के लिए कन्फर्म टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने हार नहीं मानी। जनरल डिब्बे की भारी भीड़ में घंटों खड़े रहने की शारीरिक अक्षमता को उन्होंने अपनी हिम्मत से मात दी।
सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘जुगाड़’ का एक ऐसा वीडियो चर्चा में है जिसे देखकर आप भी कहेंगे—’बिहारी दिमाग का कोई मुकाबला नहीं!’ मामला मुंबई से रक्सौल जाने वाली अंत्योदय एक्सप्रेस का है। त्योहार की भीड़ में जब विक्रम नाम के भाई को पैर रखने की जगह नहीं मिली, तो उसने सीधे दुकान से प्लास्टिक की कुर्सी उठाई और जनरल बोगी में अपनी पर्सनल सीट आरक्षित कर ली। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि अपने परिवार के साथ त्योहार मनाने की वो जिद थी, जिसके आगे सिस्टम की लाचारी भी छोटी पड़ गई।
विक्रम ने बताया कि त्योहार पर घर आने के लिए उसने ट्रेन टिकट की काफी कोशिश की, लेकिन सीट कन्फर्म नहीं हो सकी। जनरल बोगी में पांव रखने तक की जगह नहीं थी और घंटों खड़े होकर इतना लंबा सफर तय करना नामुमकिन लग रहा था। इसी परेशानी से बचने के लिए उसने देसी दिमाग लगाया और मुंबई में ही एक मजबूत प्लास्टिक की कुर्सी खरीदी। इसके बाद वह कुर्सी लेकर बोगी में सवार हो गया और बीच रास्ते में कुर्सी जमाकर बैठ गया।
यह घटना कोई ‘मजेदार जुगाड़’ नहीं, बल्कि आम नागरिकों की मजबूरी और रेलवे के मिसमैनेजमेंट का जीता-जागता सबूत है। जब तक ट्रेनों में कोच की संख्या और फेरे वास्तविक भीड़ के अनुपात में नहीं बढ़ाए जाएंगे, तब तक यात्री इसी तरह जोखिम भरा सफर करने को मजबूर रहेंगे। मुजफ्फरपुर जंक्शन पर जिसने भी यह नजारा देखा, वह अपनी हंसी नहीं रोक पाया। लोगों का कहना है कि रेलवे को अब इस जुगाड़ू भाई को ‘इनोवेशन अवॉर्ड’ दे देना चाहिए!