मानसिक प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न: विश्वविद्यालयों में शोध के दौरान शोषण पर जांच शुरू
बेताब अहमद
पटना। विश्वविद्यालयों को ज्ञान का मंदिर माना जाता है, लेकिन वहां से आ रही उत्पीड़न की खबरें व्यवस्था में सुधार का एक बड़ा अवसर भी लेकर आई हैं। बिहार के विश्वविद्यालयों में शोध कर रहे विद्यार्थियों का भविष्य और सुरक्षा दांव पर है। पिछले छह महीनों में महिला आयोग और थानों तक पहुंची यौन उत्पीड़न व मानसिक प्रताड़ना की 13 शिकायतें यह बताने के लिए काफी हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में निगरानी तंत्र कितना कमजोर है। एक तरफ जहां गाइड और शोधार्थी का रिश्ता गुरु-शिष्य का माना जाता है, वहीं इस पवित्र रिश्ते की आड़ में हो रहा शोषण और इसके बाद पीड़ित विद्यार्थियों का दाखिला रद्द किए जाने जैसी घटनाएं व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करती हैं।
शोधार्थी ने इस कार्रवाई को लेकर न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। इस मामले में लगाये गये आरोपों और विश्वविद्यालय की ओर से उठाये गये कदमों की विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। इनमें एक विश्वविद्यालय में महिला प्रोफेसर के खिलाफ एक छात्र की शिकायत भी शामिल है। इन शिकायतों ने विश्वविद्यालयों में रिसर्चर्स के अधिकारों, उनकी सुरक्षा और शिकायतों पर कार्रवाई की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, सभी मामलों में लगाये गये आरोपों की पुष्टि और संबंधित संस्थानों की कार्रवाई का विस्तृत ब्योरा सामने नहीं आया है।
पीएचडी की डिग्री के साथ अपने सुनहरे भविष्य का सपना लेकर विश्वविद्यालय पहुंचने वाले युवाओं को जब गाइड के चैंबर में मानसिक प्रताड़ना या शारीरिक शोषण का सामना करना पड़े, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि भरोसे का कत्ल है। वर्ष 2023 में शिकायत करने पर एक छात्रा का दाखिला ही रद्द कर देना और उसे न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण में जाना पड़ना। यह उस पीड़ा को बयां करता है जिससे आज के युवा गुजर रहे हैं। महिला आयोग की अध्यक्ष प्रो. अप्सरा की यह चिंता बिल्कुल सही है कि जब तक पहचान की गोपनीयता और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक बेटियां और युवा शोधार्थी अपनी आवाज उठाने से डरते रहेंगे। पीरबहोर थाने में दर्ज प्राथमिकियों और महिला आयोग तक पहुंचे मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘इंटरनल कंप्लेंट कमेटी’ और विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रहे हैं। बायोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग से लेकर कॉलेज स्तर तक विभागाध्यक्षों और सुपरवाइजरों पर लगे गंभीर आरोप जांच के दायरे में हैं।
अब शोधार्थी चुप बैठने के बजाय अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। महिला आयोग की पहल और निष्पक्ष जांच की मांग ने इस दिशा में सकारात्मक संकेत दिए हैं। यदि विश्वविद्यालय पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र और सख्त एंटी-हैरेसमेंट सेल लागू करें, तो शोधार्थियों का खोया हुआ भरोसा फिर से जीता जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि केवल बयानबाजी न हो, बल्कि दोषियों पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई की जाए। अब देखना यह है कि महिला आयोग की सख्ती के बाद क्या इन पीड़ित शोधार्थियों को न्याय मिल पाएगा या यह फाइलें भी धूल फांकती रह जाएंगी।