नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के जिस फैसले को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ कहकर प्रचारित किया गया, आज उसी रास्ते पर अमेरिका खुद खड़ा नजर आ रहा है। अक्टूबर 2026 में ट्रंप प्रशासन द्वारा रूसी डीजल के आयात पर प्रतिबंधों में ढील देने का फैसला वैश्विक राजनीति में भारत के स्टैंड की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है। यह कदम साबित करता है कि जब बात राष्ट्रीय हित और घरेलू महंगाई की आती है, तो महाशक्तियां भी अपने ही बनाए नियमों को ताक पर रख देती हैं।

यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंचों पर पश्चिमी देशों के पाखंड को बेनकाब किया था। भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और अडिग रहा है। भारत ने साफ कहा था कि “यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि उसकी समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की नहीं हैं।” भारत ने हमेशा तर्क दिया कि एक विकासशील देश होने के नाते, अपने नागरिकों को सस्ता ईंधन देना उसकी नैतिक और संप्रभु जिम्मेदारी है। यदि भारत ने रूस से तेल न खरीदा होता, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू लेतीं, जिससे पूरी दुनिया त्रस्त हो जाती। आज जब अमेरिका ने खुद मध्यावधि चुनावों और घरेलू ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए रूसी डीजल के आगे घुटने टेक दिए हैं, तो भारत का यह तर्क पूरी तरह सही साबित होता है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल स्थायी ‘राष्ट्रीय हित’ होते हैं। अक्टूबर 2026 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा रूसी डीजल के आयात पर प्रतिबंधों में ढील देने का फैसला इसी शाश्वत नियम को एक बार फिर साबित करता है। यह कदम न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करेगा, बल्कि पश्चिमी देशों के उस नैतिक आख्यान को भी कटघरे में खड़ा करता है, जिसके तहत भारत जैसे देशों को रूसी तेल खरीदने पर घेरा जाता रहा है। यह स्थिति उस समय पैदा हुई है जब अमेरिका पिछले कुछ वर्षों से रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है और साल 2025 में अतिरिक्त टैरिफ भी लगा चुका है।

यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस सच को उजागर करता है जहां नैतिकता की परिभाषाएं भूगोल और देश की ताकत के हिसाब से बदल जाती हैं। क्या राजस्व केवल भारत के तेल से मिलता है? यदि भारत द्वारा खरीदा गया रूसी कच्चा तेल मॉस्को के युद्ध फंड को मजबूत करता है, तो अमेरिकी कंपनियों द्वारा खरीदा जाने वाला रूसी डीजल भी बिल्कुल वही काम करेगा। भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि विकासशील देशों के लिए ऊर्जा तक सस्ती पहुंच एक मानवीय आवश्यकता है। अमेरिका का हालिया कदम अनजाने में ही सही, लेकिन भारत के इसी पुराने तर्क की संप्रभुता को सही ठहराता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई बातचीत के बाद, अमेरिकी वित्त विभाग ने अप्रैल 2027 तक रूसी डीजल के आयात से जुड़े लेनदेन को अस्थायी छूट दे दी है। इस फैसले के पीछे दो मुख्य कारण हैं। अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रही हैं। नवंबर में होने वाले अमेरिकी चुनाव से ठीक पहले ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करना ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी राजनीतिक मजबूरी है। हालांकि, इस फैसले का खुद अमेरिका के भीतर विरोध हो रहा है। अमेरिकी सांसदों का ही मानना है कि इससे मॉस्को को वह अतिरिक्त राजस्व मिलेगा, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन युद्ध में कर सकता है। भारत अपनी गरीब आबादी के लिए तेल खरीदे तो वह ‘युद्ध को बढ़ावा’ है, लेकिन अमेरिका अपने चुनावों को जीतने और लग्जरी गाड़ियों के लिए डीजल खरीदे तो वह ‘व्यावहारिक आर्थिक प्रबंधन’ है? अमेरिका के इस कदम ने वैश्विक प्रतिबंधों की साख को पूरी तरह खत्म कर दिया है। यह दिखाता है कि प्रतिबंध केवल कमजोर देशों को दबाने या भू-राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।
रूसी डीजल पर पाबंदियां हटाकर अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब बात खुद के राजनीतिक और आर्थिक हितों पर आती है, तो वैश्विक प्रतिबंधों और नैतिक दावों को ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है। यह कदम वैश्विक मंच पर भारत के उस स्टैंड को मजबूत करता है कि “दुनिया को किसी एक देश के चश्मे से नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय वास्तविकताओं के आधार पर चलना चाहिए।”