जहाँ पूजी जाती हैं मां दुर्गा, वहाँ क्यों अपनों की राह देख रही हैं वृद्ध माताएं?
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
पटना। एक तरफ हम नवरात्रि में कन्या पूजन करते हैं, मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना करते हैं, और दूसरी तरफ उन माताओं को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया। पटना से लेकर पूर्णिया तक के वृद्धाश्रमों में बैठीं ये 60% से अधिक महिलाएं समाज की उस सोच पर सवाल हैं, जो पत्थरों में भगवान ढूंढती है लेकिन घर की जीती-जागती देवियों को बेगाना कर देती है। गुलजारबाग या गया के आश्रमों में जो 60 से अधिक माताएं हैं, वे केवल बेटों की राह नहीं देख रहीं, बल्कि हमारे खोखले होते जा रहे पारिवारिक मूल्यों को देख रही हैं।
नवरात्रि में भी उनकी आँखों में उम्मीद की किरण है। नवरात्रि में एक ओर मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा हो रही है, तो दूसरी ओर बिहार के वृद्धाश्रमों में कई ऐसी माताएं हैं, जो अपने बच्चों की राह देख रही हैं। उनकी आंखों में आज भी यही उम्मीद है कि शायद बेटा आएगा, हाथ थामेगा और उन्हें घर ले जाएगा। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी इन माताओं के पास रहने, खाने और देखभाल की व्यवस्था तो है, लेकिन अपने परिवार का साथ और अपनों का अपनापन नहीं है। कोई मां बेटे की तस्वीर को याद कर आंसू बहाती है, तो कोई हर सुबह भगवान से अपने परिवार के लौट आने की प्रार्थना करती है।
ये आंकड़े जैसे गया में 92 में से 65 महिलाएं, पटना में 97 में से 64 बिहार के युवाओं से एक सवाल पूछते हैं। आज करियर और आधुनिकता की दौड़ में हम इतने आगे निकल गए कि उस हाथ को ही पीछे छोड़ दिया जिसने चलना सिखाया था? इस नवरात्रि पर सबसे बड़ा पुण्य पंडाल घूमना नहीं, बल्कि इन माताओं के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान लाना होगा। लाचारी के बजाय उनकी हिम्मत और एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव को दिखाना। भले ही अपनों ने छोड़ दिया, लेकिन वे आश्रम को ही अपना नया परिवार बनाकर जी रही हैं। अपनों के ठुकराए जाने के बाद भी इन माताओं की आंखों की उम्मीद टूटी नहीं है। वृद्धाश्रमों में ये महिलाएं अब एक-दूसरे का सहारा बन चुकी हैं। एक मां का बेटा नहीं आया, तो वह दूसरी मां के आंसू पोंछ रही है। यह कहानी सिर्फ अकेलेपन की नहीं, बल्कि उम्र के इस मोड़ पर भी डटकर जीने के उनके हौसले की है।
इस नवरात्रि जब पूरा बिहार मां दुर्गा के स्वागत में पंडालों को रोशनी से सजा रहा है, तब सूबे के वृद्धाश्रमों में रह रहीं 60% से अधिक माताएं अपनी सूनी आंखों में उम्मीद का एक दीया जलाए बैठी हैं। पटना, गया, भागलपुर और पूर्णिया के आश्रमों से आई तस्वीरें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारी आस्था केवल नौ दिनों के उपवास तक सीमित है? असली नवरात्रि तो तब सार्थक होगी, जब इन जीवित देवियों को उनके हिस्से का सम्मान और अपनों का साथ वापस मिलेगा।