शशि तुलस्यान
मसौढ़ी। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है। ऐसे अवसर पर उन गुमनाम नायकों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना जीवन संघर्ष में लगा दिया। मसौढ़ी प्रखंड के घोरहुआं गांव निवासी 101 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र सिंह ऐसे ही जीवित योद्धाओं में शामिल हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके चेहरे पर देशभक्ति का वही जुनून और आवाज में आजादी के संघर्ष की यादें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
महज 15 वर्ष की उम्र में रामचंद्र सिंह 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। उस समय वे करीब 10 युवाओं की टोली के साथ गुप्त रूप से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे। बातचीत के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों को याद करते हुए बताया कि वे लोग अंग्रेजी शासन के खिलाफ कई तरह की गतिविधियों में शामिल होते थे।
रामचंद्र सिंह के अनुसार, “हम लोग रेलवे की पटरियां उखाड़ते थे, अंग्रेज अधिकारियों का विरोध करते थे। रात के अंधेरे में गांव-गांव जाकर दीवारों पर नारे लिखते और अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे चिपकाते थे। मेरा काम क्रांतिकारी संदेश और पर्चे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना था।”
आजादी की लड़ाई के दौरान रामचंद्र सिंह को कई बार जेल जाना पड़ा। अंग्रेजी हुकूमत की ओर से उन्हें यातनाएं भी सहनी पड़ीं, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। कम उम्र में ही उन्होंने देश की आजादी के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और अंग्रेजी शासन के खिलाफ लगातार सक्रिय रहे।
रामचंद्र सिंह बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी पत्नी बूंदकुंवर देवी ने भी हर कदम पर उनका साथ दिया। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने पति के संघर्ष को समझा और कठिन परिस्थितियों में उनका मनोबल बनाए रखा।
101 वर्ष की उम्र में भी रामचंद्र सिंह की याददाश्त और देश के प्रति उनका जज्बा बरकरार है। आजादी के उन दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं कि आजादी आसानी से नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे कुर्बानियों और संघर्ष की लंबी कहानी है।
रामचंद्र सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का जीवन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। उनके संघर्ष की कहानी बताती है कि देश की आजादी के लिए हजारों लोगों ने कठिनाइयां सहीं और अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इन्हीं सेनानियों के संघर्ष और बलिदान की बदौलत आज देशवासी स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।