बेताब अहमद
औरंगाबाद। एक गरीब परिवार के सिर से उसकी छत क्या छिनी, एक माँ की पूरी दुनिया ही उजड़ गई। गुरुवार की रात तक जो घर बच्चों की किलकारियों से गूंज रहा था, वह चंद पलों में मलबे के ढेर और चीख-पुकार में बदल गया। औरंगाबाद जिले के ओबरा थाना क्षेत्र के सिंहुड़ी (बेल सिंहुड़ी) गांव में एक पुराने मिट्टी के मकान की दीवार और छत गिरने से 12 साल की मासूम बबली की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि उसकी माँ और तीन भाई-बहन इस मलबे की चपेट में आकर जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
दूर देस में कमा रहा पति, यहाँ बिखर गया आशियाना
पूनम देवी का पति कन्हैया विश्वकर्मा मीलों दूर गुड़गांव में रहकर दिन-रात मजदूरी करता है, ताकि गाँव में रह रहे उसके बच्चों का भविष्य संवर सके। पूनम अकेले ही अपने चारों बच्चों—नंदनी, रिमी, कुंदन और बबली को संभाल रही थी। गुरुवार की रात भी सब कुछ सामान्य था। माँ ने अपने बच्चों को दुलार कर खाना खिलाया और मिट्टी के उसी पुराने कमरे में सुला दिया, जिसे वे अपना सुरक्षित आशियाना समझते थे। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि यह रात उनके जीवन में इतना बड़ा अंधेरा लेकर आने वाली है। ‘अचानक भरभराकर गिरी छत और सब खत्म हो गया’।
अस्पताल के बिस्तर पर सिसकती माँ
पूनम देवी ने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया, “हम सब गहरी नींद में थे। तभी अचानक एक जोरदार आवाज हुई और भरभराकर छत और दीवार हमारे ऊपर गिर गई। संभलने का एक पल भी नहीं मिला। पूरा कमरा मलबे में तब्दील हो गया और हम पांचों उसमें दफन हो गए। “अंधेरे और मलबे के बीच से जब बच्चों की चीखें और माँ की कराह गूंजी, तो पूरा गाँव दहल उठा। ग्रामीण बिना वक्त गंवाए मौके पर पहुंचे और हाथों से मलबा हटाना शुरू किया। काफी मशक्कत के बाद सबको बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बबली की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी।
अस्पताल की चौखट पर टूट गई आखिरी उम्मीद
गाँव वाले सभी घायलों को लेकर आनन-फानन में औरंगाबाद सदर अस्पताल भागे। डॉक्टरों की टीम ने तुरंत जांच शुरू की, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। डॉक्टरों ने 12 साल की बबली को मृत घोषित कर दिया। अस्पताल परिसर माँ की चीत्कारों से गूंज उठा। वहीं, घायल नंदनी, रिमी और कुंदन का इलाज जारी है, जो अपनी बहन के खोने के गम और चोट के दर्द से बेहाल हैं। यह हादसा पीछे छोड़ गया है एक कभी न भरने वाला जख्म और एक बेबस परिवार के आंसू।
ग्रामीणों का कहना है कि मकान बेहद पुराना था, लेकिन पीड़ित परिवार के पास इसे पक्का कराने के साधन नहीं थे। अब ग्रामीण आक्रोशित हैं और उन्होंने प्रशासन की सुस्ती पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि कागजी कार्रवाई छोड़कर प्रशासन तुरंत पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवजा दे और घायलों को बेहतर इलाज मुहैया कराए।