विधानसभा सचिवालय ने पेंशन रोकने का दिया आदेश, दूसरी ओर प्रमोद चंद्रवंशी ने उठायी वेतन-भत्ते की मांग
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
औरंगाबाद। बिहार विधानसभा सचिवालय ने पन्द्रहवीं विधानसभा के ओबरा क्षेत्र से सदस्य रहे सोम प्रकाश सिंह को दी जा रही सदस्य पेंशन तत्काल प्रभाव से बंद करने का आदेश जारी किया है। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 जनवरी 2026 को दिए गए फैसले एवं बिहार के महाधिवक्ता से प्राप्त विधिक परामर्श के आधार पर की गई है।
इस संबंध में विधानसभा सचिवालय के अवर सचिव जय प्रकाश दूबे ने महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) कार्यालय, पटना को पत्र भेजकर निर्देश दिया है कि सोम प्रकाश सिंह को पूर्व सदस्य के रूप में मिल रही पेंशन एवं अन्य सुविधाओं को तत्काल प्रभाव से रोका जाए।
पत्र में उल्लेख किया गया है कि सिविल अपील संख्या 5652/2014 “सोम प्रकाश सिंह बनाम प्रमोद सिंह चंद्रवंशी” में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद प्राप्त विधिक राय के अनुसार सोम प्रकाश सिंह को बिहार विधानसभा का सदस्य नहीं माना जा सकता। ऐसे में वे 15वीं बिहार विधानसभा के कार्यकाल से जुड़े किसी भी लाभ, जिसमें पेंशन संबंधी सुविधाएं भी शामिल हैं, के हकदार नहीं होंगे।
इधर, इस फैसले के बाद ओबरा विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। न्यायिक लड़ाई लड़ने वाले एवं तब के चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंद्वी प्रमोद सिंह चंद्रवंशी ने इसे “सत्य की जीत” बताते हुए कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय एवं विधानसभा सचिवालय के आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि 15वीं बिहार विधानसभा के दौरान सोम प्रकाश सिंह की सदस्यता वैध नहीं थी। उनके अनुसार इसका अर्थ है कि उस अवधि में ओबरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व विधिसम्मत रूप से शून्य माना जाएगा।
श्री चंद्रवंशी ने कहा है कि वर्षों के संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया के बाद सत्य की विजय हुई है तथा यह फैसला लोकतंत्र, संविधान और न्यायपालिका की गरिमा को मजबूत करने वाला है। उन्होंने मांग की है कि 15वीं बिहार विधानसभा के उस कार्यकाल के दौरान उन्हें वैधानिक रूप से सदस्य घोषित किया जाए तथा पिछले 16 वर्षों से लंबित वेतन, भत्ता एवं अन्य सुविधाओं का भुगतान अविलंब किया जाए।
बताया गया है कि इस संबंध में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष एवं चुनाव आयोग को पत्र भेजकर न्यायोचित कार्रवाई की मांग की गई है। संबंधित पक्ष ने यह भी कहा है कि यदि इस स्तर पर न्याय नहीं मिला तो वे अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
राजनीतिक एवं कानूनी हलकों में इस पूरे घटनाक्रम को बिहार की संसदीय राजनीति और निर्वाचन न्यायशास्त्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला माना जा रहा है, जिस पर आने वाले दिनों में और बहस तेज होने की संभावना है।