नामांकन के लिए भटक रहीं छात्राएं, 6 किलोमीटर दूर जंगल के रास्ते स्कूल जाने की मजबूरी
नवबिहार टाइम्स संवाददाता
अंबा (औरंगाबाद)। बिहार सरकार भले ही “पढ़ेगा बिहार, बढ़ेगा बिहार” का नारा दे रही हो, लेकिन औरंगाबाद जिले के देव और कुटुंबा प्रखंड के सीमावर्ती गांवों में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। यहां बच्चों, खासकर छात्राओं, के लिए हाई स्कूल तक पहुंचना किसी संघर्ष से कम नहीं रह गया है।
मामला देव प्रखंड की बनुआ और बरंडा रामपुर पंचायत का है, जहां रहने वाले बच्चों को नौवीं कक्षा में नामांकन के लिए उत्क्रमित उच्च विद्यालय बरंडा भेजा जाता है। लेकिन यह विद्यालय कई गांवों से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित है और वहां तक पहुंचने का रास्ता घने जंगली इलाके से होकर गुजरता है। सुनसान रास्ता और जंगली जानवरों का भय अभिभावकों के लिए बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि लड़कियों को प्रतिदिन जंगल के रास्ते स्कूल भेजना सुरक्षित नहीं है। यही वजह है कि कई अभिभावक अपनी बेटियों की पढ़ाई को लेकर असमंजस में हैं। स्थिति यह हो गई है कि कुछ छात्राओं के सामने पढ़ाई छोड़ने की नौबत आ गई है।
देव प्रखंड के कोडीयारी गांव की छात्राएं अंजलि, पीहू, अदीबा और अजूबा पिछले कई दिनों से नामांकन के लिए बीआरसी कुटुंबा का चक्कर लगा रही हैं। छात्राओं का कहना है कि उनके गांव के निकट कुटुंबा प्रखंड का हाई स्कूल डुमरी स्थित है, जहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। लेकिन प्रखंड की सीमा अलग होने के कारण वहां नामांकन में तकनीकी अड़चनें आ रही हैं।
छात्राओं ने बताया कि यदि उन्हें डुमरी हाई स्कूल में नामांकन की अनुमति मिल जाए तो वे नियमित रूप से पढ़ाई कर सकेंगी। वहीं बरंडा स्कूल तक जंगल के रास्ते जाना उनके लिए जोखिम भरा और कठिन है।
ग्रामीणों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन एवं शिक्षा विभाग से मांग की है कि सीमावर्ती क्षेत्रों के बच्चों की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें नजदीकी विद्यालय में नामांकन की विशेष अनुमति दी जाए, चाहे वह विद्यालय दूसरे प्रखंड में ही क्यों न हो।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो कई छात्राएं बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाएंगी, जिससे सरकार की शिक्षा और बालिका सशक्तिकरण योजनाओं पर भी सवाल खड़े होंगे।