नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
औरंगाबाद। जिले के ओबरा प्रखंड अंतर्गत मनौरा गांव में भगवान गौतम बुद्ध की प्राचीन पाषाण प्रतिमा क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। लगभग छह फीट ऊंची काले पत्थर से निर्मित इस प्रतिमा को स्थानीय स्तर पर करीब 1350 वर्ष या उससे अधिक पुराना बताया जाता है। हालांकि, प्रतिमा की सही आयु और निर्माण काल की आधिकारिक पुष्टि के लिए विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक है। प्राचीन मगध की बौद्ध परंपरा से जुड़ा यह स्थल अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और अनूठी पहचान के कारण विशेष महत्व रखता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के बाद बोधगया से सारनाथ की यात्रा पर जा रहे थे। इसी दौरान उनके मनौरा गांव में ठहरने की बात कही जाती है। मान्यता है कि इसी स्मृति में यहां बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की गई थी। हालांकि, बुद्ध के यहां वास्तव में ठहरने और प्रतिमा की स्थापना के समय की पुष्टि करने वाले ठोस ऐतिहासिक प्रमाण अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। मनोरा के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। जनवरी 2025 में तत्कालीन जिला पदाधिकारी श्रीकांत शास्त्री ने स्थल का निरीक्षण किया था और इसके विकास के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर चर्चा की थी।
वहीं 13 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, स्थल पर बुनियादी सुविधाओं और सौंदर्यीकरण का अभाव बना हुआ है। प्रखंड विकास पदाधिकारी की ओर से संबंधित विभाग को प्रस्ताव भेजे जाने की जानकारी भी दी गई थी। जिले की ऐसी विरासत है, जिसके इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियां अभी शोध की प्रतीक्षा कर रही हैं। प्रतिमा की सही आयु, निर्माण काल और कलात्मक शैली का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, तो इससे क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने में मदद मिल सकती है। स्थल का व्यवस्थित विकास होने से यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों, इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। इसके साथ ही स्थानीय संस्कृति को पहचान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई संभावनाएं मिल सकती हैं।