नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
रांची। झारखंड में लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं की पवित्रता पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है। सीआईडी की जांच में खुलासा हुआ है कि इन प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली का दायरा सिर्फ पर्चा लीक तक सीमित नहीं था, बल्कि डिजिटल डेटा से छेड़छाड़ और अति सुरक्षित स्ट्रांग रूम तक पहुंच बनाकर कॉपियां लिखवाने का एक हाई-टेक सिंडिकेट चल रहा था।
साफ्टवेयर के जरिए डिजिटल सें धमारी जांच में सामने आया है कि परीक्षा कराने वाली आउटसोर्सिंग एजेंसियों ने सुनियोजित तरीके से साफ्टवेयर और पोर्टल में हेरफेर किया। वेंडर एजेंसी ‘मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड’ के कर्मी हेमंत वर्मा ने सीआईडी के सामने चौंकाने वाला खुलासा किया है। उसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश विधानसभा की आरओ/एआरओ परीक्षा की तर्ज पर ही झारखंड में भी खेल किया गया। वर्ष 2025 में टीडीपीएल के निदेशकों ने ‘पिकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड’ के साथ मिलकर जेपीएससी परीक्षाओं के लिए एक खास साफ्टवेयर तैयार किया था। इस साफ्टवेयर के जरिए परीक्षा से पहले ही ‘सेटिंग’ वाले उम्मीदवारों को चिन्हित कर लिया जाता था और सीधे डेटाबेस में उनके अंक बदल दिए जाते थे।
धांधली का खेल सिर्फ कंप्यूटर तक नहीं था। सीआईडी की पूछताछ में गिरफ्तार आरोपियों, निदेशकों और बिचौलियों ने बताया कि अति सुरक्षित माने जाने वाले स्ट्रांग रूम से मुख्य परीक्षा की उत्तरपुस्तिकाओं को बाहर निकाला जाता था। होटलों और किराए के फ्लैटों में खास विशेषज्ञों को बुलाकर उन कॉपियों को दोबारा लिखवाया जाता था। इसके बाद, बिना किसी भनक के उन कॉपियों को वापस गुप्त तरीके से स्ट्रांग रूम में रख दिया जाता था।
सीआईडी की विशेष जांच टीम अब इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए तकनीकी साक्ष्यों, सर्वर लॉग्स और वित्तीय लेन-देन की बारीकी से जांच कर रही है। पूछताछ में सामने आए इनपुट के आधार पर सिंडिकेट से जुड़े अन्य चेहरों की तलाश जारी है।
यह किसी फिल्मी कहानी जैसा है, लेकिन सच है। सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्र अधिकारी परीक्षा की सुरक्षा में सेंध लगाकर कॉपियों को बाहर निकाला जाता था और काम होने के बाद वापस स्ट्रांग रूम में छिपा दिया जाता था। इस पूरे खेल का खुलासा मुख्य आरोपी अभय तिवारी ने सीआईडी के सामने किया है।जांच में सामने आया कि रांची के हरिओम टावर में बकायदा एक कमरा किराए पर लेकर ‘कंट्रोल रूम’ बनाया गया था। पंजाब, हरियाणा और लखनऊ से ‘उत्तर पुस्तिका विशेषज्ञ’ बुलाए गए, जिन्होंने कॉपियां लिखीं। कसर पूरी करने के लिए कॉलेज और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों को पैसे देकर अंक बढ़वाए गए। आरोपी अभय तिवारी ने खुद कबूला है कि इस पूरे गोरखधंधे के लिए उसने 40 लाख रुपये की भारी-भरकम घूस दी थी।
परीक्षाओं की शुचिता पर एक बार फिर बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। सहायक वन संरक्षक और वन क्षेत्र अधिकारी परीक्षा में हुई धांधली यह बताती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। शिक्षा जगत की नैतिकता भी तब तार-तार हो गई जब कॉपियों को जांचने वाले प्रोफेसरों ने पैसों के बदले अंक बढ़ा दिए। अभय तिवारी द्वारा 40 लाख रुपये देने की बात स्वीकार करना यह दिखाता है कि योग्य उम्मीदवारों के हक को मारने के लिए किस स्तर पर पैसों का खेल खेला जा रहा था।