मूलभूत सुविधा नहीं, शिक्षा से निकला विकास का रास्ता
डॉ. उपेंद्र कश्यप
दाउदनगर (औरंगाबाद)। बिहार में जातीय दुर्भावना और अतिवादी वाम संगठनों और निजी सेना के बीच जारी नरसंहारों के सिलसिला का अंतिम पड़ाव औरंगाबाद जिले का मियांपुर बना था। वर्ष 2000 में 16 जून की रात यहां 33 व्यक्तियों की हत्या कर दी गई थी, जिसमें महिला और बच्चों की संख्या अधिक थी। तमाम वादे नेताओं ने किया किंतु उसे निभाया नहीं गया विकास की योजनाओं के नाम पर वह दृश्य अब भी याद आता है जब एक पेड़ में लेटर बॉक्स टांग कर डाकखाना खोल देने का दावा किया गया। काफी समय तक गांव पहुंचने लायक सड़क भी अच्छी नहीं बन सकी थी।
26 वर्ष हो गए उस नरसंहार के। विकास की छटपटाहट में ग्रामीणों ने बदला नहीं बल्कि बदलाव का रास्ता चुना और यहीं से तरक्की और समृद्धि दोनों गांव में आने लगे। हालांकि अभी यह गांव इतनी तरक्की नहीं कर गया है कि इसे विकसित गांव कहा जाए। लेकिन युवाओं ने शिक्षा का रास्ता चुना और नौकरी के जरिए समृद्धि हासिल करने की कोशिश की, जिसमें बहुत हद तक कामयाबी मिली।
मंगलवार को 26वीं बरसी पर आयोजन कर मृत आत्माओं की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई और श्रद्धांजलि भी दी गई। सभा की अध्यक्षता शिक्षक अमरेश कुमार तो संचालन शिक्षक निरंजन कुमार ने की। मुख्य अतिथि के रूप में सीपीआई नेता सह अंचल महामंत्री, सीपीआई, अंचल गोह, सुरेश प्रसाद यादव मौजूद रहे। इनके अलावे शोकाकुल परिवार के सदस्यों में लक्ष्मन यादव, सुरेश यादव, रामप्रवेश यादव, रामाधार यादव, अशोक यादव, युगल पासवान, रामजी यादव, मुनेश्वर पासवान, उदय कुमार, सोनू कुमार, विकास कुमार, ब्रजेश कुमार, श्रीकांत कुमार, नीलेश कुमार, पप्पू कुमार, चंद्र देव मिस्त्री उपस्थित रहे।
निरंजन कुमार ने कहा कि आज भी उस घटना को याद कर गांव के लोग सिहर जाते हैं, लेकिन लोग बदले की नहीं बदलाव का संकल्प लिया और आज कलम के दम पर अपनी सफलता का परचम लहरा रहे हैं। मुख्य अतिथि ने कहा कि मियांपुर हमारे हृदय में है। मैं हमेशा सहयोग के लिए तत्पर रहूंगा। अमरेश कुमार ने कहा कि उतनी बड़ी घटना के बाद तमाम घोषणाएं हुयी लेकिन आज भी मूलभूत विकास नहीं हो सका है गांव का।
ग्रामीण लालू यादव व अन्य ने बताया कि शिक्षा के दम पर यहां के आठ युवा शिक्षक बने। दो दारोगा, एक एमबीबीएस, एक रेलवे ड्राइवर, दो युवा बिहार पुलिस में गए। तीन युवा रेलवे में कर्मी बने। एक होम गार्ड, दो बीएएमएस डाक्टर बने। इसके अलावा कई युवा नौकरी एवं अन्य रोजगार के माध्यम से गांव की तस्वीर बदलने में अपना योगदान दे रहे हैं।