नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
काठमांडू/पटना। नेपाल में प्राकृतिक आपदा के इस बेहद कठिन समय में मानवीय एकता और पड़ोसी धर्म की मिसाल देखने को मिल रही है। विकट परिस्थितियों के बावजूद, नेपाल के स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियों के साथ मिलकर भारतीय बचाव दल दिन-रात राहत कार्यों में जुटा हुआ है। मलबे के बीच जिंदगी को बचाने और प्रभावितों तक मदद पहुंचाने के लिए दोनों देशों की टीमें कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। यह संकट की घड़ी भले ही भारी है, लेकिन आपसी सहयोग और सेवा भाव इस आपदा से उबरने की बड़ी उम्मीद जगा रहा है।
नेपाल में आई आपदा से मलबे के ढेर से अब ज़िंदगियों की उम्मीदें कम और शवों के मिलने का सिलसिला ज़्यादा बढ़ गया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 908 मासूम जिंदगियां हमेशा के लिए शांत हो चुकी हैं, जबकि 3,000 से अधिक परिवारों की आंखें अब भी अपने लापता अपनों के इंतजार में पथरा रही हैं। हालात इस कदर दर्दनाक हैं कि जिन शवों को अपनों की शिनाख्त का इंतजार था, उन्हें फ्रीजर की कमी के चलते बिना पहचान के ही सुपुर्द-ए-खाक करना पड़ रहा है। करीब 200 अज्ञात शवों को नम आंखों से दफना दिया गया है, जो इस आपदा की सबसे बड़ी बेबसी है।
नेपाल में आए प्रलयकारी सैलाब और भूस्खलन ने जनजीवन को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया है। चारों तरफ पसरे मलबे के बीच अपनों को तलाशते लोगों की चीख-पुकार और लगातार मिलते शवों ने इस आपदा की विभीषिका को और दर्दनाक बना दिया है। हालात इतने मार्मिक हैं कि शवों को रखने के लिए फ्रीजर तक कम पड़ गए हैं, जिसके चलते लगभग 200 अनाथ और अज्ञात शवों को भारी मन से दफनाना पड़ा। 200 अज्ञात शवों को दफनाने की मजबूरी यह दिखाती है कि स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन तंत्र के पास आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए फ्रीजर या मोर्चरी जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं थीं।
इस घनघोर अंधेरे में भारत और नेपाल के राहत दल मिलकर उम्मीद की किरण जगा रहे हैं। मलबे के ढेर से जिंदगी को सुरक्षित बाहर निकालने की जद्दोजहद जारी है, जिसमें अब तक 149 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बचाकर दोनों देशों के अटूट बंधनों और सहयोग की मिसाल पेश की गई है। आपदा के बाद उफनती नदियों और मलबे से लगातार मिल रहे शवों ने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र की सीमाएं तोड़ दी हैं। डीएनए प्रोफाइलिंग और विशेष पहचान नंबर सुरक्षित रखे गए हैं, ताकि भविष्य में अपनों के मिलने पर उन्हें सम्मानजनक ढंग से सौंपा जा सके।
इस वीरान मंजर के बीच कुछ ऐसी बानगी भी हैं जो चेहरे पर हल्की सी मुस्कान ले आती हैं। एक स्कूल के बच्चे, जो महज दोपहर के भोजन के लिए कक्षा से बाहर आए थे, कुदरत के इस तांडव से बाल-बाल बच गए। वक्त का यह चंद मिनटों का अंतराल उनके लिए काल के गाल में समाने और जीवन सुरक्षित बच जाने के बीच की लकीर साबित हुआ। टूटी सड़कें, दरकी पहाड़ियां और बाढ़ से कटे रास्ते राहत दलों के आगे हर पल एक नई दीवार खड़ी कर रहे हैं। 900 से अधिक जिंदगियों को लील चुकी इस त्रासदी के बाद अब प्राथमिकता मलबे में दबे हुओं को ढूंढना और भारत समेत अन्य सहयोगियों के जरिए राहत पहुंचाना है।