नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
पटना। बिहार सरकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता सबसे पहले करती है। ग्रामीण इलाकों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की योजना के बीच, जब सरकार को यह फीडबैक मिला कि घरेलू होल्डिंग टैक्स से आम ग्रामीणों, किसानों और मजदूरों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है, तो मुख्यमंत्री ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाई। सरकार ने साफ कर दिया है कि आम जनता की जेब पर कोई अतिरिक्त भार नहीं डाला जाएगा।
बिहार के ग्रामीण इलाकों में पक्के और अर्धपक्के मकानों पर होल्डिंग टैक्स लगाने के फैसले पर सरकार अब पूरी तरह ग्रामीण जनता की नाराजगी को देखते हुए सम्राट सरकार अपने इस नीतिगत फैसले में बड़ा संशोधन करने की तैयारी कर रही है। नए प्रस्ताव के तहत अब गांवों के आवासीय मकानों को टैक्स के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा, जिससे करोड़ों ग्रामीण परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी।
15 जुलाई को कैबिनेट द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में टैक्स वसूलने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद से ही जमीन पर इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया था। महंगाई की मार झेल रहे किसानों, मजदूरों और गरीब परिवारों में इस टैक्स को लेकर भारी असंतोष था। विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया और सरकार पर ‘गरीब विरोधी’ होने का आरोप लगाते हुए चौतरफा हमला बोल दिया। आगामी चुनावों और ग्रामीण वोट बैंक खिसकने के डर से सरकार को कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा। सबसे ज्यादा किरकिरी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने गरीबों के आशियानों पर भी टैक्स लगाने के प्रस्ताव को लेकर हो रही थी, जिसे अब हटाने की तैयारी है।
अब ‘हर घर’ नहीं, सिर्फ ‘व्यावसायिक संपत्तियों’ पर नजर पंचायती राज विभाग अपनी इस नीति को अब पूरी तरह री-डिजाइन कर रहा है। चूंकि इस फैसले का गजट नोटिफिकेशन अभी जारी नहीं हुआ है, इसलिए सरकार के पास नियमों को बदलने का पूरा मौका है। अब सरकार का पूरा फोकस आम ग्रामीणों के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों से राजस्व जुटाने पर टिक गया है।
ग्रामीण इलाकों में मौजूद निम्नलिखित संपत्तियों पर टैक्स लगाया जा सकता है। जिसमें होटल, मैरिज हॉल, सिनेमा हॉल, पेट्रोल पंप, औद्योगिक इकाइयां, गैस एजेंसियां, और बड़ी राइस मिल। व्यावसायिक या संस्थागत उपयोग में आने वाली अन्य इमारतें। पंचायतों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए उठाया गया यह कदम सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया था। इस संशोधन के बाद सरकार ने यह साफ कर दिया है कि वह आम जनता पर वित्तीय बोझ डाले बिना केवल व्यावसायिक संपत्तियों से ही अपनी आमदनी बढ़ाएगी।
15 जुलाई को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद भी सरकार ने जल्दबाजी में गजट या अधिसूचना जारी नहीं की। इसके पीछे का मुख्य कारण यही था कि सरकार जमीनी हकीकत और जनता की सहूलियत को परखना चाहती थी। अधिसूचना जारी होने से पहले ही नियमों में सुधार की यह तैयारी दिखाती है कि बिहार सरकार एक ‘लचीली और जनता के सुझावों का सम्मान करने वाली सरकार’ है।