नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
नई दिल्ली। मृत्यु प्रमाण पत्र यानी डेथ सर्टिफिकेट को लेकर 1 अक्टूबर 2026 से नियमों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ्स एण्ड डेथ्स अमेंडमेंट एक्ट 2026 के प्रावधान 1 अक्टूबर से लागू होंगे। नए कानून में जन्म और मृत्यु के देरी से होने वाले रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को ज्यादा सख्त किया गया है। इस बदलाव का खास असर उन मामलों पर पड़ेगा, जिनमें मृत्यु या जन्म की जानकारी तय समय के काफी बाद रजिस्ट्रार को दी जाती है। कानून के तहत अब एक साल से ज्यादा और दो साल तक की देरी तथा दो साल से ज्यादा की देरी के लिए अलग-अलग स्तर पर मंजूरी का प्रावधान होगा।
1 अक्टूबर से क्या बदलेगा?
नए कानून के अनुसार, अगर मृत्यु की जानकारी एक साल से ज्यादा लेकिन दो साल के भीतर रजिस्ट्रार को दी जाती है, तो रजिस्ट्रेशन के लिए जिला मजिस्ट्रेट , उप-मंडल मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा। संबंधित अधिकारी मृत्यु की जानकारी की सत्यता की जांच के बाद आदेश जारी कर सकेंगे। वहीं, अगर मृत्यु की जानकारी दो साल से ज्यादा समय बाद दी जाती है, तो अब रजिस्ट्रेशन के लिए Judicial Magistrate First Class का आदेश जरूरी होगा। मजिस्ट्रेट भी घटना की सही जानकारी और उसकी प्रमाणिकता की जांच के बाद ही रजिस्ट्रेशन का आदेश दे सकेंगे।
अभी और नए नियम में क्या अंतर है?
मौजूदा व्यवस्था में एक साल से ज्यादा देरी वाले जन्म या मृत्यु पंजीकरण के लिए जिला मजिस्ट्रेट, एसडीएम या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश का प्रावधान है। 2026 का संशोधन इस व्यवस्था को दो हिस्सों में बांटता है-एक से दो साल की देरी के लिए कार्यकारी स्तर की मंजूरी और दो साल से अधिक की देरी के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी। सरकार के अनुसार, इस बदलाव का उद्देश्य जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन में होने वाली देरी को कम करना और समय पर जानकारी दर्ज कराने को प्रोत्साहित करना है।
डेथ सर्टिफिकेट कहां बनता है?
मृत्यु का रजिस्ट्रेशन उस क्षेत्र के रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ्स एण्ड डेथ्स के पास कराया जाता है, जहां मृत्यु हुई है। स्थानीय व्यवस्था के अनुसार यह जिम्मेदारी नगर निगम, नगर पालिका, पंचायत या अन्य स्थानीय प्राधिकरण के पास हो सकती है। केंद्र सरकार का सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम पोर्टल कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऑनलाइन जन्म-मृत्यु पंजीकरण की सुविधा भी उपलब्ध कराता है। अगर मृत्यु किसी अस्पताल में हुई है, तो अस्पताल की ओर से मृत्यु के कारण से संबंधित मेडिकल प्रमाणपत्र जारी किया जाता है और मृत्यु की जानकारी रजिस्ट्रार तक पहुंचाने की प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल होता है। कानून में मेडिकल संस्थानों द्वारा मृत्यु के कारण का प्रमाणपत्र देने का प्रावधान भी किया गया है।
डेथ सर्टिफिकेट बनवाने के लिए जरूरी डॉक्यूमेंट
जरूरी दस्तावेज राज्य और स्थानीय निकाय के नियमों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर मृत्यु से संबंधित मेडिकल प्रमाणपत्र या अस्पताल का रिकॉर्ड मांगा जा सकता है। इसके अलावा मृत व्यक्ति का नाम, जन्म से जुड़ी जानकारी, मृत्यु की तारीख और स्थान, मृत्यु की जानकारी देने वाले व्यक्ति का विवरण और निर्धारित आवेदन पत्र जैसे दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है। देरी से रजिस्ट्रेशन के मामलों में नए कानून के तहत संबंधित प्राधिकारी द्वारा मृत्यु की जानकारी की सत्यता की जांच भी की जाएगी। दो साल से ज्यादा की देरी होने पर जुडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के आदेश की आवश्यकता होगी।
समय पर मृत्यु का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी
मृत्यु प्रमाण पत्र कई जरूरी कानूनी और वित्तीय प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होता है। मृत्यु का आधिकारिक रिकॉर्ड होने से परिवार को बीमा, बैंक खातों, निवेश, संपत्ति और अन्य दावों से जुड़ी प्रक्रियाओं में दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध होता है। इसलिए 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले बदलाव के बाद लंबे समय से लंबित मृत्यु पंजीकरण के मामलों में प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक औपचारिक और जांच आधारित होगी।