नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
पटना। बिहार की शिक्षक नियुक्ति नियमावली एक बार फिर चौराहे पर खड़ी है। क्या प्रशासनिक नीतियां हर वर्ग के अभ्यर्थी के लिए एक समान पैमाना तय कर पा रही हैं? ताजा मामला शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के आवास पर उमड़ी उन दो लाख सीटीईटी अपीयरिंग उम्मीदों का है, जो व्यवस्था के गलियारों में समानता के अधिकारों की गूंज लेकर पहुंचे हैं।
आंखों में शिक्षक बनने का सपना लेकर शिक्षा मंत्री के दरवाजे पर खड़े सीटीईटी अभ्यर्थियों का दर्द छलक उठा। अभ्यर्थी रोमा कुमारी ने कहा कि शिक्षा मंत्री से रिक्वेस्ट करने आएं हैं कि जब बिहार विद्यालय परीक्षा समिति या शिक्षा विभाग ने एसटीईटी पास शामिल उम्मीदवारों को टीआरई-4.0 में आवेदन का विशेष अवसर या छूट दी, तो केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए यही उदारता क्यों नहीं दिखाई गई ?
अभ्यर्थी रोमा कुमारी ने कहा कि क्या पात्रता परीक्षाओं के बीच का यह प्रशासनिक विभेद संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) के दायरे में प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल नहीं खड़ा करता? जमीनी हकीकत यह है कि यह सिर्फ कुछेक प्रदर्शनकारियों का मामला नहीं है, बल्कि लगभग 2 लाख ऐसे योग्य युवाओं की किस्मत दांव पर है जो वर्षों से पसीना बहा रहे हैं।
छात्र नेता नरेंद्र सिंह यादव ने कहा कि बीपीएससी टीआरई-1.0 के दौरान भी सीटीईटी अपीयरिंग को मौका मिला था। ऐसे में विभाग की मौजूदा चयन प्रक्रिया में अचानक आए इस नीतिगत बदलाव के पीछे कौन-से प्रशासनिक तर्क या विवशताएं हैं, यह पड़ताल का विषय है। अभ्यर्थी धीरज कुमार ने कहा कि यह आक्रोश सिर्फ एक मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस व्यवस्था से सवाल है कि क्या नीति निर्धारण में ‘समानता और योग्यता’ का पैमाना हर आवेदक के लिए एक जैसा नहीं होना चाहिए?
मोहम्मद यासीन और धीरज कुमार जैसे युवाओं का कहना है कि सरकार की दोहरी नीति उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। अभ्यर्थियों का तर्क है कि टीआरई-4 भर्ती प्रक्रिया में एसटीईटी और सीटीईटी अभ्यर्थियों के बीच दिखाई दे रहा नीतिगत अंतर बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब योग्यता का पैमाना एक है, तो चयन प्रक्रिया में यह भेदभाव क्यों? सीटीईटी अभ्यर्थियों ने सरकार के समक्ष एक न्यायसंगत मांग रखी है। उनका कहना है कि वे भी परीक्षा के जरिए अपनी योग्यता साबित करने का मौका मांग रहे हैं, ताकि वे भी राज्य के विकास में योगदान दे सकें।