सावन के प्रथम सोमवार पर विशेष रिपोर्ट
डॉ. उपेंद्र कश्यप
दाउदनगर (औरंगाबाद)। देवकुण्ड धाम जिले का सबसे प्रमुख शिवनगरी सावन में बाबा के जलाभिषेक के लिए तैयार है। प्रथम सोमवार का अपना महत्व है। इस शिवमंदिर से कई किवंदतियां जुड़ी हुई है। गोह प्रखण्ड में यह स्थित है और इसे त्रेतायुगीय शिव स्थान बताया जाता है। श्रावण-सोमवार को काफी संख्या में भक्त उपस्थित होते हैं। घंटों की प्रतीक्षा के बाद बाबा का दर्शन होता है।
यहां के पोखरा को सहस्त्रधारा वाला बताया जाता है। उसी में स्नान कर उसी का जल शिव पर चढ़ाया जाता है। हर समय महामृत्युंजय का जप और रुद्राभिषेक होते रहा है। इस मन्दिर को भव्यता और सुंदरता पूर्व की अपेक्षा काफी अधिक महंत कन्हैयानन्द पुरी ने दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सर्व प्रथम सन्यासी मठ महंत द्वारा सरकारी पूजा होती है। तत्पश्चात सभी के लिए द्वार खोल दिया जाता है। सन्ध्या छह बजे आरती के बाद पट (द्वार) बन्द हो जाता है। प्रातः चार बजे पट (द्वार) खुलता है।
आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री बताते हैं कि यह महर्षि च्यवन की तपस्थली है। भगवान् श्रीराम गया श्राद्ध करने के लिए जाते समय यहां विश्राम किये। महर्षि च्यवन के अनुरोध पर श्रीराम ने भगवती सीता के साथ शिव लिंग स्थापना किया। यह महाकाल ज्योतिर्लिंग का उपज्योतिर्लिग है। यह दुग्धेश से दुग्धेश्वर नाथ कहे जाने लगे। काला नीलम के होने की बात कही जाती है।
श्री शास्त्री बताते हैं कि सातवीं शताब्दी में प्रीति कुट (पीरु) के रहने वाले गद संस्कृत के आदि महाकवि, उपन्यास कार बाण भट्ट प्रत्येक दिन अपने गांव से यहां आकर पूजा करते थे। संस्कृत भाषा के गीतकार पं. कमलेश मिश्र वासाटाड़ (अरवल) ने दुग्धेश्वर नाथ की संस्कृत और हिन्दी में स्तुति की है। यह मगध का तीसरा महत्वपूर्ण तीर्थ है। भगवान् श्री बाबा दुग्धेश्वर महादेव के द्वार से कोई खाली नहीं जाता है। खाली झोली लेकर आता है और भर कर जाता है। जो चाहा वही पाया।