– शव मिला नहीं, फिर भी कर दिया अंतिम संस्कार; मगर एक बेबस पिता की आँखें आज भी ढूंढ रही हैं अपना सुमित
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
हाजीपुर। होर्मूज जलडमरूमध्य में हुए मिसाइल हमले ने बिहार के एक हंसते-खेलते परिवार को कभी न भूलने वाला जख्म दे दिया है। हाजीपुर जिला के किरतपुर राजाराम गांव के रहने वाले मर्चेंट नेवी कर्मी सुमित कुमार के घर में आज सिर्फ चीखें और सन्नाटा है। सुमित की पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है, तो बूढ़े पिता की आंखें अब भी पथराई हुई हैं। दिल को झकझोर देने वाली बात यह है कि सुमित के दो छोटे बच्चों को अब तक यह भी नहीं पता कि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे आज भी दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठे हैं।
घटना से महज कुछ घंटे पहले सुमित ने हंसते हुए परिवार से फोन पर बात की थी। उसने कहा था, “जहाज एक खतरनाक रास्ते से गुजर रहा है, पार करते ही फोन करूँगा।” लेकिन वह फोन कभी नहीं आया। एक साथी कर्मी के फोन ने परिवार की उम्मीदें तोड़ दीं। सोमवार को जब गांव में सुमित का दशकर्म (श्राद्ध कर्म) हुआ, तो हर आंख नम थी। अपनों ने नम आंखों से सुमित के पुतले का अंतिम संस्कार कर विदाई तो दे दी, लेकिन परिवार का दिल आज भी इस कड़वे सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 12 सितंबर की रात ओमान के पास होर्मूज जलडमरूमध्य में एक ईरानी कंपनी के जहाज पर हुए मिसाइल हमले के बाद से भारतीय क्रू मेंबर सुमित कुमार लापता हैं। भगवानपुर थाना क्षेत्र के निवासी सुमित पिछले 5 वर्षों से मर्चेंट नेवी में तैनात थे। घटना के एक दस दिन बाद भी सुमित का कोई सुराग न मिलने पर उनके परिजनों ने प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार संपन्न कर दिया है। लेकिन भारत सरकार की ओर से अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
हमले के वक्त जहाज पर 25 क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें से 13 को बचा लिया गया, लेकिन सुमित का सुराग नहीं मिला। एक पिता के दिल पर क्या गुजरती है जब उसे अपने जीते-जी बेटे का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करना पड़े? किरतपुर राजाराम गांव के दीप नारायण सिंह आज इसी असहनीय दर्द से गुजर रहे हैं। मर्चेंट नेवी में कार्यरत उनके बेटे सुमित कुमार का जहाज जब मिसाइल हमले का शिकार हुआ, तब से सुमित का कुछ पता नहीं है। सुमित की मौत की खबर सुनकर परिवार ने भारी मन से उसका अंतिम संस्कार तो कर दिया, लेकिन एक पिता का दिल इस सच को मानने को तैयार नहीं है। रो-रोकर बेहाल हो चुके दीप नारायण सिंह को अब भी यकीन है कि उनका सुमित एक दिन जिंदा वापस लौटेगा। इस गहरे अंधकार में डूबा यह परिवार खुद ही दूतावास और विदेश मंत्रालय से संपर्क कर उम्मीद की कोई किरण तलाशने में जुटा है।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि वे लगातार भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सरकार या प्रशासन की ओर से उन्हें कोई आधिकारिक जानकारी या मदद नहीं मिल रही है। एक तरफ जहां सुमित की पत्नी और दो मासूम बच्चे बेसहारा हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय प्रशासन की यह बेरुखी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। स्थानीय प्रशासन या किसी जनप्रतिनिधि के संपर्क न करने के बाद, अब सुमित के पिता दीप नारायण सिंह और उनका परिवार खुद सीधे तौर पर विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास और संबंधित ईरानी कंपनी से संपर्क स्थापित कर रेस्क्यू और जांच की स्थिति की जानकारी जुटा रहा है।
यह घटना एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा और संघर्ष वाले क्षेत्रों में व्यापारिक जहाजों पर मंडराते खतरों को रेखांकित करती है। सुमित के परिजन अब विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास और संबंधित ईरानी कंपनी से आधिकारिक जानकारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं। परिवार की मांग है कि सुमित के बारे में स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि वह जीवित है तो उसे सुरक्षित वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाए। वहीं यदि उसकी मौत की पुष्टि हो चुकी है तो परिवार को इसकी आधिकारिक जानकारी और आवश्यक प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट सूचना दी जाए।