बेताब अहमद
औरंगाबाद। बिहार राज्य के औरंगाबाद के शहरीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। नगर परिषद को ‘नगर निगम’ में अपग्रेड करने की प्रशासनिक प्रक्रिया तेज हो गई है। प्रस्ताव के तहत सदर प्रखंड की 8 पंचायतों (ओरा, पोईवा, बेला, करमा भगवान, कुरम्हा, खैराबिन्द, खरकनी और हसौली) को इसमें जोड़ा जा रहा है। इन ग्रामीण इलाकों के जुड़ने से शहर का क्षेत्रफल मौजूदा आकार से चार गुना बड़ा हो जाएगा। निगम क्षेत्र की कुल आबादी में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी की उम्मीद है। दूर-दराज के गांवों तक पक्की सड़कें, नालियां और शुद्ध पेयजल पहुंचाना आसान नहीं होगा। बढ़े हुए क्षेत्रफल में साफ-सफाई और कचरा उठाव की व्यवस्था को दुरुस्त रखना बड़ी चुनौती होगी। जलजमाव से निपटने और हर कोने में स्ट्रीट लाइट लगाने के लिए ठोस योजना की जरूरत होगी। 15 सितंबर तक प्रस्ताव को राज्य सरकार के पास भेजने की तैयारी है। जिलाधिकारी के स्तर से हरी झंडी मिलने के बाद 20 सूत्री समिति की बैठक में इस पर मुहर लगेगी। अंतिम फैसला राज्य सरकार को करना है।
औरंगाबाद को नगर निगम में तब्दील करने की सुगबुगाहट के साथ ही ग्रामीण इलाकों में विरोध की लहर दौड़ गई है। सूत्रों के मुताबिक, कई गांवों के निवासी इस फैसले से खुश नहीं हैं और उन्होंने नगर परिषद कार्यालय पहुंचकर अपनी लिखित आपत्ति भी दर्ज करा दी है। ग्रामीणों की मुख्य चिंता यह है कि कृषि प्रधान क्षेत्रों को निगम में शामिल करने से उन पर शहरी टैक्स का बोझ बढ़ सकता है, जबकि उन्हें विकास योजनाएं मिलने की गारंटी नहीं दिख रही है। ऐसे में प्रशासन के लिए एक तरफ कृषि भूमि और आबादी के मानकों को पूरा करना चुनौती है, तो दूसरी तरफ जनता के इस भारी विरोध को शांत करना भी एक बड़ी परीक्षा बन गया है।
आठ पंचायतों को नगर निगम में शामिल करने की कवायद ने स्थानीय ग्रामीणों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि नगर निगम बनने के बाद इस बड़े कृषि आधारित क्षेत्र का वजूद कैसे बचेगा। मानकों के अनुसार यदि कृषि भूमि का हिस्सा ज्यादा रहता है, तो सीमांकन में बदलाव का खतरा है। ग्रामीण इस बात को लेकर भी असमंजस में हैं कि क्या उन्हें शहरी सुविधाएं समय पर मिल पाएंगी या वे सिर्फ भारी-भरकम टैक्स के जाल में फंस कर रह जाएंगे। बड़े क्षेत्रफल के कारण अंतिम वार्ड तक समान रूप से बजट और संसाधन पहुंचना प्रशासन के लिए एक कठिन परीक्षा साबित होने वाला है।
सभी पंचायतों को एक साथ थोपने के बजाय केवल तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों को शामिल करना प्रशासनिक दृष्टि से एक परिपक्व कदम हो सकता है। इससे आबादी और क्षेत्रफल का संतुलन बेहतर रहेगा और नगर निगम पर शुरुआती दबाव कम होगा। पंचायत प्रतिनिधियों (मुखिया, सरपंच आदि) की भूमिका का समाप्त होना एक स्वाभाविक राजनीतिक संक्रमण है। पारंपरिक नेता अब पार्षद बनकर शहरी विकास की मुख्य धारा में अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरुआत कर सकते हैं, जिससे स्थानीय राजनीति में नए नेतृत्व का उदय होगा। वार्ड 4 और वार्ड 15 जैसी असमानताओं को दूर करने का यह बेहतरीन अवसर है।बड़े वार्डों का पुनर्गठन करके छोटे और सुव्यवस्थित वार्ड बनाने से विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति और हर कोने तक पारदर्शिता के साथ पहुंच सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों की आपत्तियों को विरोध के रूप में देखने के बजाय प्रशासनिक संवाद की कमी माना जा सकता है। यदि प्रशासन लोगों को निगम के लाभों (बेहतर बुनियादी ढांचा, सुविधाएं) के बारे में आश्वस्त करे, तो विरोध के स्वर स्वतः विकास की सहमति में बदल सकते हैं।
नगर निगम बनने से पंचायत स्तर के पद (मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य आदि) समाप्त हो जाएंगे। ग्रामीण जनप्रतिनिधियों के विरोध के बीच, स्थानीय नेता अब पार्षद का चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकते हैं, जिससे नए राजनीतिक समीकरण बनेंगे।वर्तमान में भी वार्ड 4 और वार्ड 15 के क्षेत्रफल में भारी अंतर है। वार्ड 4 बहुत बड़ा है जबकि वार्ड 15 छोटा है। निगम बनने पर ऐसे बड़े क्षेत्रों का पुनर्गठन करना एक बड़ी चुनौती होगी ताकि हर जगह समान विकास हो सके।
निगम बनने से शहर में चौड़ी सड़कें, आधुनिक नालियां, शुद्ध पेयजल और बेहतरीन सफाई व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त होगा। यदि आठ नई पंचायतों को इसमें जोड़ा जाता है, तो गांवों में भी शहरी तर्ज पर विकास कार्यों की गति तेज होगी। महानगरों जैसी सुविधाएं मिलने से बड़े निवेशकों का रुझान बढ़ेगा, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। जिलाधिकारी के स्तर से प्रस्ताव तैयार होकर जल्द ही आगे बढ़ने की उम्मीद है। 20 सूत्री बैठकों और स्थानीय चर्चाओं के जरिए इस ऐतिहासिक फैसले को मूर्त रूप दिया जा रहा है। प्रशासन और सरकार के सहयोग से औरंगाबाद एक आधुनिक, सुंदर और सुव्यवस्थित शहर बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है।