नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
मुजफ्फरपुर। जिले के औराई प्रखंड अंतर्गत सहिलाबल्ली पंचायत के आदमपुर भवानीपुर गांव में गुरुवार सुबह एक बड़ा हादसा हो गया। यहाँ महादलित टोले में स्थित एक जर्जर सामुदायिक भवन का मलबा गिरने से कोचिंग पढ़ रहे आधा दर्जन बच्चे और उनकी शिक्षिका गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी घायलों को स्थानीय लोगों की मदद से अस्पताल पहुंचाया गया है।

ग्रामीणों के अनुसार, भवन की हालत लंबे समय से खराब थी और इसके खिलाफ कई बार शिकायतें भी की गई थीं, लेकिन प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। हादसे के वक्त बच्चे भवन के अंदर नि:शुल्क कोचिंग क्लास में पढ़ाई कर रहे थे, तभी अचानक छत का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। घटना के बाद से इलाके के लोगों में प्रशासनिक लापरवाही को लेकर भारी आक्रोश है। हादसे के तुरंत बाद स्थानीय ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए मलबे से बच्चों और शिक्षिका को सुरक्षित बाहर निकाला और निजी चिकित्सकों से उनका प्राथमिक उपचार कराया। राहत की बात है कि सभी घायल खतरे से बाहर हैं। हालांकि, इस घटना ने प्रशासनिक लापरवाही को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

पूर्व मुखिया लक्ष्मण ठाकुर के अनुसार, इस जर्जर भवन की मरम्मत के लिए विभाग को दर्जनों बार लिखित और मौखिक रूप से आगाह किया गया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। घटना के बाद से क्षेत्र में भारी तनाव और आक्रोश है। प्रशासन अब मामले की लीपापोती करने के बजाय जवाबदेही तय करने के दबाव में है। जिस सामुदायिक भवन की छत के नीचे बच्चे अपने कल को संवार रहे थे, वही छत उनका काल बनने चली थी। मलबे के नीचे दबे मासूमों की चीखें और शिक्षिका की बेबसी देखकर पूरा गांव रो पड़ा। जहाँ कुछ देर पहले बच्चों की आवाज़ें गूंज रही थीं, वहाँ अब सिर्फ धूल का गुबार, खून के धब्बे और दबी हुई कॉपियां-किताबें बची हैं। यह हादसा सिर्फ एक इमारत का गिरना नहीं, बल्कि इन गरीब बच्चों के सपनों पर हुआ एक गहरा प्रहार है।
मुजफ्फरपुर के औराई में आखिरकार वही हुआ जिसका डर था। अफसरों की घोर लापरवाही और सरकारी तंत्र की सुस्ती की कीमत इस बार मासूम बच्चों को अपने खून से चुकानी पड़ी है। आदमपुर भवानीपुर गांव में जब कुछ गरीब बच्चे एक जर्जर सरकारी इमारत में अपना भविष्य गढ़ने बैठे थे, तब उन्हें क्या मालूम था कि व्यवस्था की बेरुखी उनकी जान की दुश्मन बन जाएगी। बार-बार की शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डालने वाले अधिकारियों के पास आज इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब भवन जर्जर था, तो उसे ढहाया क्यों नहीं गया? क्या सिस्टम हमेशा किसी बड़े हादसे और मासूमों की चीख-पुकार सुनने का ही इंतज़ार करता है? आज औराई की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कागजी दावों से इतर जमीनी हकीकत कितनी खोखली और जानलेवा है।
क्या महादलित वर्ग के बच्चों की सुरक्षा सरकारी प्राथमिकताओं में कभी शामिल होगी? सहिलाबल्ली पंचायत में हुआ हादसा कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि सिस्टम की आपराधिक लापरवाही का जीता-जागता सबूत है। ग्रामीणों की बार-बार की चेतावनियों और पूर्व मुखिया के दर्जनों आवेदनों को अफसरों ने अपनी फाइलों में दबाए रखा। नतीजा यह हुआ कि मासूम बच्चे और उनकी शिक्षिका मौत के मुंह में जाते-जाते बचे। अगर ग्रामीणों ने तुरंत मलबा हटाकर उन्हें न निकाला होता, तो आज कई घरों के चिराग बुझ चुके होते। इस घटना ने वंचित समाज के प्रति व्यवस्था की संवेदनहीनता को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है, जिससे पूरे इलाके में तीखा आक्रोश फैल गया है।