राख को चुनौती के बजाय संसाधन के रूप में उपयोग करने की दिशा में बड़ी पहल
राख से बन रही विकास की राह, लिखी जा रही सर्कुलर इकोनॉमी की नई कहानी
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
पटना। कभी ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख को औद्योगिक अपशिष्ट मानकर उसके निस्तारण की चिंता की जाती थी, लेकिन आज वही राख बिहार की सड़कों की नींव मजबूत कर रही है, निर्माण उद्योग के लिए कच्चा माल बन रही है और स्थानीय उद्यमों को रोजगार के अवसर दे रही है। फ्लाई ऐश और पोंड ऐश का यह बदलाव केवल राख के उपयोग की कहानी नहीं, बल्कि अपशिष्ट को संसाधन में बदलने वाली सर्कुलर इकोनॉमी का ऐसा उदाहरण है, जिसमें बिजली उत्पादन से निकला उप-उत्पाद विकास की अगली कड़ी बन रहा है।

एनटीपीसी ने राख को चुनौती के बजाय संसाधन के रूप में उपयोग करने की दिशा में लगातार पहल की है। कंपनी की ऐश यूटिलाइजेशन नीति का उद्देश्य राख का अधिकतम, सुरक्षित और सतत उपयोग सुनिश्चित करना है। वर्ष 2024-25 में एनटीपीसी समूह ने लगभग 105 मिलियन टन राख का उत्पादन किया, जिसमें करीब 103 मिलियन टन यानी 98 प्रतिशत राख का उपयोग किया गया। पूर्वी क्षेत्र-1 के बाढ़, कहलगांव, बरौनी, नबीनगर, कांटी, बीआरबीसीएल और फरक्का सहित सातों स्टेशन राख के उपयोग को बढ़ाने में जुटे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में पूर्वी क्षेत्र-1 ने लगभग 129 प्रतिशत ऐश यूटिलाइजेशन हासिल कर इस दिशा में अपनी प्रतिबद्धता मजबूत की।
बिहार के तेजी से विकसित हो रहे सड़क नेटवर्क में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बाढ़–राजौली फोरलेन में सड़क निर्माण से जुड़े विभिन्न भराव कार्यों में एनटीपीसी की पोंड ऐश का उपयोग किया गया है। खगड़िया–पूर्णिया सड़क परियोजना के साथ बिहार में निर्मित और निर्माणाधीन कई राष्ट्रीय राजमार्गों, स्टेट हाईवे, बाईपास और सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं में भी एनटीपीसी पूर्वी क्षेत्र-1 के स्टेशनों से उपलब्ध फ्लाई ऐश और पोंड ऐश का इस्तेमाल हो रहा है।
एनएच-80 के मुंगेर–भागलपुर–कहलगांव–मिर्जाचौकी फोरलेन में सड़क तटबंध और अन्य निर्माण कार्यों में फ्लाई ऐश का उपयोग किया गया है। एनएच-31 के बख्तियारपुर–बाढ़–मोकामा खंड में बाईपास और फोरलेन निर्माण के दौरान एप्रोच रोड तथा भराव कार्यों के लिए एनटीपीसी की पोंड ऐश उपलब्ध कराई गई। एनएच-28 और एनएच-122 के मुजफ्फरपुर–बरौनी–बेगूसराय क्षेत्र में एनटीपीसी बरौनी और कांटी की फ्लाई ऐश का उपयोग किया गया है। वाराणसी–रांची–कोलकाता एक्सप्रेसवे के बिहार खंड जैसे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के लिए भी विभिन्न एनटीपीसी संयंत्रों से रेल-कम-रोड माध्यम से राख पहुंचाई जा रही है।
राख के उपयोग का महत्व केवल उसकी खपत बढ़ाने तक सीमित नहीं है। फोरलेन, बाईपास, फ्लाईओवर और पुलों के एप्रोच रोड तथा तटबंध निर्माण में बड़ी मात्रा में भराव सामग्री की जरूरत होती है। तकनीकी मानकों के अनुरूप फ्लाई ऐश और पोंड ऐश का उपयोग प्राकृतिक मिट्टी के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इससे मिट्टी की खुदाई और परिवहन पर निर्भरता घटती है तथा कृषि योग्य भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।
एनटीपीसी पूर्वी क्षेत्र-1 की पहल तकनीकी नवाचार तक भी पहुंची है। एनटीपीसी कहलगांव परिसर के निकट लगभग 2.9 किलोमीटर लंबी सीमेंट-मुक्त जियोपॉलीमर सड़क फ्लाई ऐश के अभिनव उपयोग का उल्लेखनीय उदाहरण है। एनटीपीसी फरक्का में भी जियोपॉलीमर कंक्रीट सड़क बनाई गई है। फ्लाई ऐश आधारित जियोपॉलीमर तकनीक कम-कार्बन और टिकाऊ निर्माण के विकल्प के रूप में संभावनाएं मजबूत कर रही है।
फ्लाई ऐश का बड़ा उपयोग सीमेंट उद्योग में भी हो रहा है। इससे क्लिंकर की आवश्यकता कम करने, प्राकृतिक खनिज संसाधनों की खपत घटाने और सीमेंट उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है। एनटीपीसी के विभिन्न स्टेशनों पर ड्राई फ्लाई ऐश के भंडारण, साइलो और लोडिंग की सुविधाओं के जरिए इसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा रहा है। एनटीपीसी कहलगांव से पांडु, असम तक अंतर्देशीय जलमार्ग से फ्लाई ऐश की आपूर्ति भी लंबी दूरी के परिवहन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
स्थानीय उद्योगों के लिए भी राख नई संभावनाएं खोल रही है। फ्लाई ऐश से ईंट, ब्लॉक, पेवर, टाइल्स और अन्य निर्माण सामग्री तैयार की जा रही है। एनटीपीसी बाढ़, कांटी, नबीनगर और बरौनी जैसे स्टेशन ईओआई प्रक्रियाओं के माध्यम से राख उपयोगकर्ताओं और सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को प्रोत्साहित कर रहे हैं तथा लगभग 300 किलोमीटर के दायरे में निःशुल्क राख उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं। पटना के एग्जीबिशन रोड स्थित ‘विकल्प’ पहल के तहत राख आधारित भवन निर्माण सामग्री के शोरूम में फ्लाई ऐश से बने उत्पादों को प्रदर्शित किया जा रहा है, ताकि आमजन, इंजीनियरों और निर्माण एजेंसियों को इनके उपयोग से परिचित कराया जा सके।
इस पूरी पहल में पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और विकास एक साथ जुड़ते दिखाई देते हैं। राख सड़क में जाती है तो प्राकृतिक मिट्टी बचती है, सीमेंट उद्योग में जाती है तो वैकल्पिक कच्चा माल बनती है और ईंट, ब्लॉक तथा पेवर में बदलकर स्थानीय उद्यमों के लिए अवसर पैदा करती है। एनटीपीसी पूर्वी क्षेत्र-1 के सातों स्टेशन इस बदलाव के केंद्र बन रहे हैं। बाढ़–राजौली फोरलेन से लेकर एनएच-80 और एनएच-31 तक, कहलगांव की जियोपॉलीमर सड़क से लेकर सीमेंट उद्योग और स्थानीय सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों तक राख ने अपनी नई उपयोगिता साबित की है।