बेताब अहमद
औरंगाबाद। स्कूल का कमरा पढ़ाई की जगह होनी चाहिए थी, जहाँ किताबें खुलतीं, ब्लैकबोर्ड पर चौक चलती और भविष्य के सपने बुने जाते। लेकिन औरंगाबाद जिला के गोह प्रखंड के बख्तियार मध्य विद्यालय के एक विशिष्ट शिक्षक अमित कुमार आनंद ने उस क्लासरूम को कुछ और ही बना दिया था। यहाँ किताबों की जगह डर का साया था, और सवाल पूछने वाले मासूम बच्चों से पढ़ाने के बजाय अपने पैर दबवाए जाते थे।
स्कूल आने वाले छोटे-छोटे छात्र-छात्राओं के मन में यह सवाल बार-बार उठता था कि जो हमें अ, आ, क, ख सिखाने आए हैं, वे हमसे ऐसा काम क्यों करवा रहे हैं? बच्चों के लिए यह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था। शिक्षक होने के नाते जिस व्यक्ति पर उनका भरोसा होना चाहिए था, वही उनका इस्तेमाल अपने आराम के लिए कर रहा था। छोटे बच्चे डर और झिझक के कारण खुलकर किसी से कुछ कह नहीं पा रहे थे, क्योंकि उन्हें अपने भविष्य और स्कूल के माहौल का डर था।
अत्याचार की भी एक सीमा होती है। जब यह सिलसिला हद से पार हुआ, तो बच्चों की घुटन बाहर आ गई। बच्चों ने अपनी इस पीड़ा को अपने अभिभावकों और गांव के मुखिया तक पहुंचाया। जैसे ही यह अखबार जब इस सुलगती हुई सच्चाई को प्रमुखता से उठाया, तो बच्चों की दबी हुई आवाज प्रशासन के कानों तक गूंज उठी। 15 सितंबर को जब शिक्षा विभाग के अधिकारी जांच के लिए स्कूल पहुंचे, तो बच्चों और ग्रामीणों का गुस्सा और दर्द सामने आ गया। जांच में जब शिक्षक ने अपना जुर्म कबूल किया, तो मासूमों के चेहरे पर एक राहत की सांस आई।
जिलाधिकारी अभिलाषा शर्मा और जिला शिक्षा पदाधिकारी के निर्देश पर जब उस शिक्षक को निलंबित किया गया, तो बच्चों और उनके परिजनों का भरोसा फिर से कानून और शिक्षा व्यवस्था पर लौट आया। आज इन छात्र-छात्राओं के मन में यह विश्वास जागा है कि स्कूल सिर्फ पढ़ाई का मंदिर है, जहाँ कोई शिक्षक भगवान नहीं बल्कि मार्गदर्शक होता है। बच्चों की इस छोटी सी हिम्मत ने दिखा दिया कि अन्याय चाहे जितना छिपा हो, सच सामने आ ही जाता है।