चारों तरफ पानी, घरों में घुसा सड़ांध मारता पानी, दवा, दूध और राशन के लिए भी नाव ही सहारा
शशि तुलस्यान
मसौढ़ी। पुनपुन प्रखंड में पुनपुन नदी का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रखंड की पांच पंचायतें बाढ़ की चपेट में हैं। बड़की सपहुआ, छोटकी सपहुआ, उड़ान टोला और मुस्तफापुर समेत दर्जनों टोले पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। सैकड़ों परिवार पिछले कई दिनों से पानी के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। कहीं कमर तक तो कहीं सीने तक पानी है। घरों में घुसा सड़ांध मारता पानी, टपकती छत और अंधेरे में गुजरती रातें बाढ़ पीड़ितों की मुश्किलों को बयां करने के लिए काफी हैं।
मुख्य सड़क से करीब चार किलोमीटर अंदर नाव के सहारे जब गांव पहुंचा गया तो हालात बेहद भयावह दिखे। पूरा गांव मानो एक बड़े तालाब में तब्दील हो चुका था। कहीं खपरैल मकान आधा पानी में डूबा था तो कहीं पक्के मकानों के दरवाजे तक पानी पहुंच चुका था। लोग अपने ही घरों की छत, मचान और अन्य ऊंचे स्थानों पर परिवार के साथ शरण लिए हुए हैं।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी समस्या नाव की कमी है। पांच टोलों के लिए महज एक सरकारी नाव उपलब्ध है। सुबह होते ही 30 से 40 लोग उस नाव पर सवार होकर जरूरी सामान लेने निकलते हैं। किसी को दवा लानी है, किसी को बच्चों के लिए दूध और राशन तो किसी को रोजमर्रा के जरूरी काम के लिए मुख्य सड़क तक पहुंचना है। शाम होते ही इसी नाव से लोगों को वापस लौटना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि किसी के अचानक बीमार पड़ने पर रात में नाव उपलब्ध नहीं होने से बड़ी परेशानी खड़ी हो जाती है। बाढ़ पीड़ितों ने प्रशासन से कम से कम दो-तीन अतिरिक्त नाव उपलब्ध कराने की मांग की है।
सरिता देवी की आंखों में आंसू थे। उन्होंने बताया, “पांच दिन से चूल्हा नहीं जला है। घर में पानी घुस गया है और अनाज भीग गया है। चार दिन से बिजली कटी है। रात होते ही अंधेरा छा जाता है और सांप-बिच्छू का डर बना रहता है।”
मालती देवी, रश्मि देवी और रुक्मिणी देवी ने बताया कि घर में दिया-सलाई और मोमबत्ती तक नहीं है। छोटे बच्चे रातभर डर के बीच रहते हैं। उन्होंने कहा कि सामुदायिक रसोई और मेडिकल टीम की व्यवस्था राहत दे रही है, लेकिन नाव के अभाव में कई लोगों के लिए वहां तक पहुंचना भी मुश्किल है।
पूर्व मुखिया द्वारिका पासवान ने बताया कि यह इलाका काफी निचला है और हर साल बाढ़ की मार झेलता है। इसके बावजूद समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं हो सकी है।
पंचायत समिति सदस्य अमर कुमार ने जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा कि चुनाव के समय नेता गांव-गांव जाकर वोट मांगते हैं, लेकिन बाढ़ में पूरा गांव डूबने के बाद कोई अंदर तक पहुंचने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों को बाढ़ पीड़ितों की वास्तविक स्थिति गांव के अंदर पहुंचकर देखनी चाहिए।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान एक बुजुर्ग महिला ने भावुक होकर कहा, “बबुआ, पहली बार कोई मीडिया वाला हमारे टोले में आया है। आप ही सरकार तक हमारा दर्द पहुंचा दीजिए। हमको कुछ नहीं चाहिए, बस थोड़ा उजाला और आने-जाने के लिए नाव दे दीजिए।”
फिलहाल अनुमंडल प्रशासन की ओर से सामुदायिक रसोईघर और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। जरूरतमंद परिवारों के बीच पॉलीथिन शीट का भी वितरण किया गया है। लेकिन जलमग्न टोलों में आवागमन के लिए पर्याप्त नावों की कमी अब भी ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। बाढ़ के पानी के बीच सैकड़ों परिवार अब इस उम्मीद में हैं कि प्रशासन उनकी आवाज सुनेगा और राहत उन तक पहुंचाने के लिए नावों की संख्या बढ़ाई जाएगी।