पूर्वी क्षेत्र-1 की परियोजनाओं के विद्यालयों में 9,429 विद्यार्थी, 8000 से अधिक गांवों की प्रतिभाओं को शिक्षा, अवसर और मार्गदर्शन से मिल रही नई उड़ान
नवबिहार टाइम्स ब्यूरो
पटना। बिजलीघर की ऊंची चिमनियों से उठती भाप और गांव की पगडंडी पर स्कूल जाते बच्चों के बीच पहली नजर में कोई रिश्ता दिखाई नहीं देता। एक तरफ मशीनों की दुनिया है, दूसरी तरफ सपनों की। लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो दोनों के केंद्र में एक ही चीज नजर आती है—ऊर्जा।
फर्क सिर्फ इतना है कि बिजलीघर की ऊर्जा तारों के रास्ते घरों तक पहुंचती है, जबकि शिक्षा की ऊर्जा पीढ़ियों के रास्ते भविष्य तक।
बिहार और पश्चिम बंगाल में एनटीपीसी की पावर प्लांट्स के आसपास इसी दूसरी ऊर्जा की एक शांत, लेकिन महत्वपूर्ण कहानी आकार ले रही है।

उन गांवों के बच्चों के लिए, जिनके लिए कभी बड़े शहर, आईआईटी और नीट जैसी परीक्षाएं किसी दूर की दुनिया के नाम थे, अब वही नाम संभावनाओं का हिस्सा बन रहे हैं।
किसी की आंखों में इंजीनियर बनने का सपना है, किसी में डॉक्टर बनने की चाहत। कोई वैज्ञानिक या प्रशासनिक अधिकारी बनने की तैयारी कर रहा है तो कोई खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाने की।
पूर्वी क्षेत्र-1 की एनटीपीसी परियोजनाओं—बाढ़, नबीनगर, कहलगांव, कांटी, फरक्का और बीआरबीसीएल से जुड़े आवासीय परिसरों के विद्यालयों में आज कुल 9,429 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इनमें लगभग 8,000 विद्यार्थी , यानी 85 प्रतिशत से अधिक, परियोजना-प्रभावित गांवों और आसपास के ग्रामीण समुदायों से आते हैं।
ये केवल आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे हजारों परिवारों की बदलती आकांक्षाएं हैं। एक ऐसी पीढ़ी, जिसके लिए गांव अब सपनों की सीमा नहीं, बल्कि उनकी शुरुआत बनता दिखाई दे रहा है।
स्कूल की कक्षा से बड़ा है इसका संसार
जिस तरह बिजलीघर में कोयला और पानी एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर ऊर्जा में बदलते हैं, उसी तरह प्रतिभा भी सही शिक्षा, अवसर और मार्गदर्शन पाकर अपनी क्षमता में बदलती है। फर्क इतना है कि बिजली की ऊर्जा मशीनों को गति देती है, जबकि शिक्षा की ऊर्जा मनुष्य और समाज की दिशा बदल सकती है।
एनटीपीसी के आवासीय परिसरों के विद्यालय इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए अधिकारी और कर्मचारी इन परियोजनाओं में काम करते हैं। इनमें अनेक इंजीनियर और पेशेवर आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों से शिक्षित हैं। उनके बच्चे भी इन्हीं विद्यालयों में पढ़ते हैं। इसलिए यहां की कक्षा सिर्फ पाठ्यपुस्तकों से नहीं बनती।
बिहार के किसी गांव से आया बच्चा देश के किसी दूसरे हिस्से से आए बच्चे के साथ पढ़ता है। अलग-अलग भाषाएं, त्योहार, संस्कृतियां और जीवन-अनुभव एक ही परिसर में मिलते हैं। स्थानीय बच्चे अपनी मिट्टी, अपनी बोली और अपनी संस्कृति के साथ इस साझा संसार का हिस्सा बनते हैं।
यहां ‘मिनी इंडिया’ किसी भाषण का शब्द नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का अनुभव है।
बिहार के प्रसिद्ध शिक्षाविद और पटना साईंस कॉलेज तथा पटना विश्वविद्यालय के गणित विभाग के लंबे समय तक विभागाध्यक्ष रहे डॉ. (प्रो.) रवीन्द्र नाथ पांडेय भी इस शैक्षणिक वातावरण को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार, एनटीपीसी परिसरों के विद्यालयों में औपचारिक शिक्षा के साथ मिलने वाला अनौपचारिक मार्गदर्शन भी बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है।
उनका कहना है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले ग्रामीण परिवेश के बच्चों के साथ एनटीपीसी के अधिकारी और इंजीनियर समय-समय पर अपने अनुभव साझा करते हैं, कठिन विषयों को सहज तरीके से समझाते हैं और शिक्षा तथा करियर की संभावनाओं से परिचित कराते हैं।
किसी ग्रामीण बच्चे के लिए आईआईटी से पढ़े किसी इंजीनियर से बातचीत या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे किसी युवा की कहानी सुनना महज एक मुलाकात
नहीं होती। कई बार वह उसके सामने भविष्य की पहली स्पष्ट तस्वीर रख देती है। शायद यहीं से सपनों की भाषा बदलती है।
जब आईआईटी दूर का नाम नहीं रहता
कभी जिन गांवों के बच्चों के हाथों में गुल्ली-डंडा हुआ करता था, उन्हीं हाथों में आज आईआईटी और नीट की किताबें हैं। इस बदलाव की सबसे ठोस गवाही उन विद्यार्थियों की उपलब्धियों में मिलती है, जिनकी सफलता उनके बाद आने वाले बच्चों के लिए रास्ता बनाती है।
एनटीपीसी पूर्वी क्षेत्र-1 के आवासीय परिसरों से जुड़े सेंट जोसफ कॉन्वेंट स्कूल, नोट्रेडेम अकादमी, डीपीएस, डीएवी, बाल भारती और केंद्रीय विद्यालय जैसे विद्यालयों में पढ़ने वाले ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों ने विभिन्न वर्षों में उल्लेखनीय शैक्षणिक परिणाम दिए हैं।
कहलगांव स्थित सेंट जोसफ कॉन्वेंट स्कूल के छात्र अपूर्व प्रणय ने वर्ष 2026 में जेईई एडवांस्ड में सफलता हासिल कर आईआईटी में प्रवेश पाया। इसी परिसर के आयुष
राज और अमृत कुमार ने इसी वर्ष राष्ट्रीय अंतर-विद्यालयी शतरंज प्रतियोगिता में जीत दर्ज की।
एक उपलब्धि प्रतियोगी परीक्षा की दुनिया से जुड़ी है, दूसरी शतरंज की बिसात से। दोनों मिलकर बताते हैं कि प्रतिभा का चेहरा एक नहीं होता।
यह सिलसिला नया नहीं है। फरक्का परिसर से जुड़े विद्यालयों के साग्निक चक्रवर्ती ने वर्ष 2021 में जेईई एडवांस्ड में सफलता हासिल की और वर्तमान में आईआईटी बॉम्बे से एमटेक कर रहे हैं। वर्ष 2022 में आदित्य कश्यप ने जेईई एडवांस्ड में सफलता प्राप्त की और राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी से केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। अंकुश दत्ता ने भी 2022 में जेईई में सफलता हासिल की।
वर्ष 2023 में आशिफा अख्तर खातून और तिलोत्तमा सरकार ने नीट में सफलता प्राप्त की, जबकि 2025 में रिक साहा ने जेईई एडवांस्ड में सफलता दर्ज की।
परियोजना-प्रभावित गांवों से आए ऐसे विद्यार्थी भी हैं, जिन्होंने एनटीपीसी के विद्यालयों में पढ़ाई के बाद भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं तक का सफर तय किया है।
इन नामों को केवल उपलब्धियों की सूची की तरह पढ़ना इस कहानी को छोटा कर देगा। असली कहानी उस बदलाव की है, जो एक विद्यार्थी की सफलता से दूसरे विद्यार्थी की कल्पना में पैदा होता है।
जब अपने ही स्कूल का कोई बच्चा आईआईटी पहुंचता है, तो आईआईटी किसी दूर शहर की अनजानी मंजिल नहीं रह जाता। वह उसी कक्षा में बैठे दूसरे बच्चे के लिए एक वास्तविक संभावना बन जाता है।
शिक्षा का शायद यही सबसे गहरा असर है वह केवल ज्ञान नहीं देती, कल्पना का क्षितिज भी बड़ा करती है।
छात्रवृत्ति से आगे, अवसर का विस्तार
इस शैक्षणिक यात्रा में आर्थिक सहयोग भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। ‘उत्कर्ष छात्रवृत्ति’ के तहत एनटीपीसी स्टेशनों में सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को हर वर्ष प्रोत्साहन के रूप में छात्रवृत्ति दी जाती है। पूर्वी क्षेत्र-1 की परियोजनाओं में हर वर्ष सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले 400 से अधिक विद्यार्थियों को इसका लाभ मिलता है। प्रत्येक विद्यार्थी को 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है।
राशि भले बड़ी न हो, लेकिन ऐसे परिवारों के लिए यह सहायता पढ़ाई से जुड़े खर्चों में सहयोग देने के साथ-साथ आगे बढ़ने का प्रोत्साहन भी बनती है।
इसी सोच का एक विशेष विस्तार है बालिका सशक्तिकरण अभियान यानी गर्ल एम्पावरमेंट मिशन (जीईएम)।
एनटीपीसी ने वर्ष 2018 में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाली ग्रामीण बालिकाओं के लिए इसकी शुरुआत की थी।
शिक्षा के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता, आत्मरक्षा, योग, खेल, रचनात्मक गतिविधियों और व्यक्तित्व विकास जैसे जीवन-कौशल को भी इसका हिस्सा बनाया गया।
एनटीपीसी के अनुसार, वर्ष 2026 तक देश के 17 राज्यों में जीईएम से 15,000 से अधिक बालिकाएं लाभान्वित हो चुकी हैं।
पूर्वी क्षेत्र-1 में वर्ष 2026 के दौरान सात परियोजना आवासीय परिसरों में आयोजित सात समर वर्कशॉप में 560 बालिकाओं ने भाग लिया। चार सप्ताह की नि:शुल्क आवासीय समर वर्कशॉप के बाद सामान्यतः उन्हीं बालिकाओं के लिए सर्दियों की छुट्टियों में एक सप्ताह की फॉलो-अप वर्कशॉप भी आयोजित की जाती है।
अर्थात सीखना केवल चार सप्ताह के शिविर तक सीमित नहीं रहता। संवाद, अभ्यास, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया आगे भी जारी रहती है। प्रत्येक परियोजना से लगभग 10 प्रतिशत मेधावी बालिकाओं का चयन कर उन्हें एनटीपीसी के आवासीय परिसरों के विद्यालयों में कक्षा 12वीं तक नि:शुल्क शिक्षा का अवसर दिया जाता है। उनकी शिक्षा से जुड़े खर्च एनटीपीसी वहन करता है।
किसी ग्रामीण बेटी के लिए यह केवल एक विद्यालय में प्रवेश नहीं है। यह उस दुनिया तक पहुंचने का अवसर है, जिसे उसने शायद अब तक दूर से देखा था।
नई किताबें, नए विषय, नए साथी और एक नया वातावरण इन सबके बीच धीरे-धीरे उसके सामने अपने भविष्य की तस्वीर भी बदलने लगती है।
मेगावाट के आंकड़ों के बीच एक और पैमाना
एनटीपीसी की परियोजनाओं को आम तौर पर मेगावाट, उत्पादन और बिजली की उपलब्धता के आंकड़ों से देखा जाता है। ये आंकड़े जरूरी हैं। लेकिन किसी परियोजना की सामाजिक यात्रा का एक दूसरा पैमाना भी होता है उसके आसपास के बच्चों की बदलती हुई दुनिया। वह दुनिया जिसमें गांव के आगे शहर दिखाई देता है जिसमें आईआईटी और नीट जैसे नाम किसी दूर की कहानी नहीं, बल्कि हासिल की जा सकने वाली मंजिलों की तरह सुनाई देते हैं।
जिसमें खेल का मैदान कक्षा जितना ही महत्वपूर्ण हो सकता है। और जिसमें एक ग्रामीण बेटी अपने लिए शिक्षा, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की राह देख सकती है।
एनटीपीसी के पावर प्लांट देश को ऊर्जा देते हैं। उन्हीं परियोजनाओं के आवासीय परिसरों के विद्यालय ज्ञान, जिज्ञासा, आत्मविश्वास और उम्मीद की एक दूसरी ऊर्जा तैयार कर रहे हैं। बिजली की रोशनी घरों और शहरों को रोशन करती है। शिक्षा की रोशनी पीढ़ियों को। और जब ये दोनों रोशनियां एक साथ जलती हैं, तो किसी बिजली परियोजना का अर्थ केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता।
उसकी रोशनी उन चेहरों पर भी दिखाई देने लगती है, जो कल अपने गांव, अपने शहर और अपने देश की कहानी लिखेंगे।
जहां एनटीपीसी के बिजलीघर देश को रोशन करते हैं, वहीं उन्हीं परियोजनाओं के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे उस रोशनी को भविष्य तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।