देश-विदेश से पहुंचे पिंडदानी, पुनपुन पांव गोदावरी पूजा के साथ शुरू किया पितृकर्म
नवबिहार टाइम्स संवाददाता
मसौढ़ी। पितृपक्ष मेले के पहले दिन शुक्रवार को पुनपुन नदी घाट पर देश-विदेश से आए पिंडदानियों की भीड़ उमड़ पड़ी। मोक्षनगरी गयाजी जाने से पहले श्रद्धालुओं ने पुनपुन नदी में स्नान कर तर्पण एवं प्रथम पिंडदान किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान और धार्मिक आस्था के साथ अपने पितरों को तिल एवं जल अर्पित कर उनकी आत्मा की शांति की कामना की।
अंतरराष्ट्रीय पितृपक्ष मेले को लेकर नेपाल के काठमांडू और विराटनगर के अलावा हिमाचल प्रदेश, कोलकाता, राजस्थान एवं जयपुर समेत विभिन्न स्थानों से पिंडदानी पुनपुन पहुंचे। धार्मिक मान्यता के अनुसार गयाजी में पिंडदान करने से पहले पुनपुन घाट पर पिंडदान करना आवश्यक माना जाता है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने माता जानकी के साथ अपने पिता राजा दशरथ का पहला श्राद्ध एवं तर्पण पुनपुन नदी के तट पर किया था। इसी कारण पुनपुन को पिंडदान का प्रथम द्वार कहा जाता है।
पुनपुन पांडा समिति के सुशील रिंकू पांडे ने बताया कि त्रिपाक्षिक श्राद्ध की शुरुआत पुनपुन नदी से ही होती है। बाहर से आने वाले श्रद्धालु सबसे पहले पुनपुन में स्नान कर तिल एवं जल अर्पित करते हैं और इसके बाद गया जाकर पितृकर्म करते हैं। उन्होंने बताया कि किसी कारणवश यदि कोई श्रद्धालु पुनपुन नहीं पहुंच पाता है, तो गया के गोदावरी तालाब में स्नान एवं पिंडदान करने से भी पुनपुन श्राद्ध के समान फल मिलने की धार्मिक मान्यता है।
उन्होंने बताया कि पितृपक्ष में मुख्य रूप से एक, तीन, सात और 17 दिन के कर्मकांड का विधान है। 17 दिनों तक किए जाने वाले पिंडदान को त्रिपाक्षिक पिंडदान कहा जाता है। इस वर्ष 28 सितंबर को पुनपुन श्राद्ध का मुख्य दिन होगा, जब हजारों श्रद्धालु पुनपुन एवं गोदावरी में विधि-विधान से पिंडदान करेंगे।
नेपाल के विराटनगर से पहुंचे अजीत तोड़ी, रूपाली तोड़ी, करनाल तोड़ी एवं सुनीता तोड़ी समेत हरदयाल थापा तथा बैरबन, आम्ही और जहदा गांव से आए सोरेंग थापा, श्रीनारायण आदि पिंडदानियों ने पुनपुन घाट पर अपने पितरों के लिए पिंडदान एवं तर्पण किया। घाट पर पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठान और श्रद्धालुओं की आवाजाही से माहौल भक्तिमय बना रहा।