बार-बार जांच करने पर कोर्ट सख्त: प्रमंडलीय आयुक्त ने रोहतास डीएम और डीईओ को दिया संचिका बंद करने का आदेश
बेताब अहमद
तिलौथू, रोहतास। किसी मामले में लोकायुक्त और उच्चाधिकारियों का फैसला आ जाने के बाद भी बार-बार जांच की प्रक्रिया जारी रखना अधिकारियों को भारी पड़ सकता है। ऐसा ही एक निर्देश पटना प्रमंडलीय आयुक्त के न्यायालय ने रोहतास के जिला पदाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी को दिया है। न्यायालय ने शिक्षक मैकू राम के प्रमाण-पत्र से जुड़े परिवाद शिकायतकर्ता अशोक कुमार मौर्य एवं योगेंद्र प्रसाद सिंह पर अंतिम फैसला देते हुए मामले को तुरंत निष्पादित (संचिका बंद) करने को कहा है। तिलौथू के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक मैकू राम को आखिरकार बार-बार की प्रशासनिक जांचों से मुक्ति मिल गई है।
रोहतास जिला के तिलौथू के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक मैकू राम के प्रमाण-पत्रों से जुड़ा 12 साल पुराना विवाद आखिरकार थम गया है। अशोक कुमार मौर्य और योगेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा दायर परिवाद पर अंतिम सुनवाई करते हुए पटना प्रमंडलीय आयुक्त के न्यायालय ने इस मामले को हमेशा के लिए ‘संचिका बंद’ (फाइल क्लोज) करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने इस संबंध में जिला पदाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी रोहतास को कड़े निर्देश जारी किए हैं।
बता दें कि वर्ष 2014 से ही मैकू राम के एसटीइएटी 2011 प्रमाण-पत्र को लेकर लगातार शिकायतें की जा रही थीं। इस दौरान लोकायुक्त, माध्यमिक शिक्षा निदेशक, आरडीडीई, डीएम और डीईओ स्तर से कई बार जांच की गई, लेकिन हर बार आरोपों को बेबुनियाद पाते हुए शिक्षक को क्लीन चिट मिली। माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने पहले ही चेतावनी दी थी कि लोकायुक्त के फैसले के बाद बार-बार प्रमाण-पत्र मांगना कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। अब प्रमंडलीय आयुक्त के इस अंतिम फैसले से बार-बार की जांच से परेशान शिक्षक को बड़ी राहत मिली है।
इस पूरे घटनाक्रम पर पीड़ित मैकू राम का दर्द और संघर्ष साफ झलकता है। उन्होंने बेबाकी से कहा, “मैं एक दलित परिवार से आता हूं। सिर्फ मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और समाज में मेरी छवि धूमिल करने की नियत से यह दुर्भावनापूर्ण शिकायतें की जा रही थीं।” मैकू राम ने स्वीकार किया कि इस झूठी और बार-बार की जाने वाली कंप्लेंट के कारण समाज में उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची थी, जिससे उनका पूरा परिवार आहत था।
इस सुनियोजित उत्पीड़न के खिलाफ मैकू राम ने चुप बैठने के बजाय कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना। उन्होंने इस मामले की शिकायत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग, बिहार पटना से की, जिस पर आयोग ने तुरंत संज्ञान लिया। इसके साथ ही, समाज में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिए उन्होंने न्यायालय में मानहानि का मुकदमा दायर किया।
तमाम प्रशासनिक दबावों और झूठे आरोपों को दरकिनार करते हुए, अंततः न्यायालय ने मैकू राम के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट के इस निर्णय ने न केवल मैकू राम को बेदाग साबित किया है, बल्कि उन तत्वों को भी कड़ा संदेश दिया है जो जातिगत द्वेष या निजी दुश्मनी के कारण किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का प्रयास करते हैं। यह जीत यह साबित करती है कि प्रशासनिक मनमानी चाहे जितनी भी हो, कानून के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।