बेताब अहमद
पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया विमर्श सरगर्म है, नाम बदलने की राजनीति’। जेडीयू (JDU) का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ करने और बख्तियारपुर का नाम ‘नीतीशपुर’ रखने की मांग अचानक तेज हो गई है। राज्यसभा सांसद संजय झा से शुरू हुआ यह सिलसिला अब मंत्री श्रवण कुमार और संतोष सुमन के बयानों से होता हुआ बिहार के सियासी गलियारों का सबसे हॉट टॉपिक बन चुका है। लेकिन इस पूरी कवायद को सिर्फ नेताओं की ‘इच्छा’ या बयानबाजी मान लेना जल्दबाजी होगी। इसके पीछे गहरे राजनीतिक मायने हैं।
जदयू पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का यह कहना कि जेडीयू का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ कर दिया जाए, यह साफ संकेत देता है कि जेडीयू के भीतर नीतीश कुमार का कद क्या है। मंत्री श्रवण कुमार ने इसका समर्थन करते हुए उन्हें ‘बिहार का विश्वकर्मा’ और ‘विकास पुरुष’ बता दिया। यह दिखाता है कि जेडीयू अब आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार करने की दिशा में बढ़ रही है कि पार्टी का वजूद पूरी तरह से ‘ब्रांड नीतीश’ पर टिका है। क्षेत्रीय दलों में नेता के नाम पर पार्टी का नाम होना कोई नई बात नहीं है (जैसे वाईएसआर कांग्रेस), लेकिन जेडीयू जैसी स्थापित पार्टी में ऐसा बदलाव एक नए युग की शुरुआत का संकेत है।
बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन द्वारा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से बख्तियारपुर का नाम ‘नीतीशपुर’ करने की मांग करना, इस राजनीति का दूसरा पहलू है। बख्तियारपुर का नाम इतिहास में बख्तियार खिलजी से जोड़कर देखा जाता रहा है। संतोष सुमन का यह तर्क कि बख्तियारपुर सिर्फ एक भौगोलिक जगह नहीं, बल्कि उस जननेता की जन्मभूमि है जिसने बिहार को बदला, यह दर्शाता है कि जेडीयू और उसके सहयोगी दल नीतीश कुमार के जीवनकाल में ही उनकी विरासत को इतिहास के पन्नों में स्थायी रूप से दर्ज करा देना चाहते हैं। चूंकि यह मांग एनडीए के सहयोगी दल की तरफ से आई है, इसलिए यह जेडीयू और हम के बीच बढ़ते तालमेल को भी दर्शाती है।
इस पूरे मामले में वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री विजेंद्र यादव का बयान सबसे संतुलित और ध्यान देने योग्य है। उन्होंने कहा, “सबकी अपनी-अपनी इच्छा है, लेकिन अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है।” विजेंद्र यादव का यह बयान दर्शाता है कि पार्टी के भीतर एक धड़ा इस बदलाव को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वे जानते हैं कि नाम बदलने से जहां एक तरफ नीतीश समर्थकों में भारी उत्साह आएगा, वहीं विपक्ष को ‘व्यक्ति पूजा’ के आरोप लगाने का बड़ा मौका मिल जाएगा।
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने बिहार की राजनीति के दिग्गज नेताओं दिवंगत रामविलास पासवान, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद प्रमुख लालू प्रसाद के योगदान को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि देश और राज्य की राजनीति में इन नेताओं के लंबे सफर और समर्पण को देखते हुए उनके नाम पर स्थलों का नामकरण करना या उनकी प्रतिमाएं लगाना पूरी तरह सही है। इस सकारात्मक पहल पर राज्य सरकार ने भी खुला रुख अपनाया है। मंत्री श्रवण कुमार ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव सामने आता है, तो सरकार उस पर पूरी संजीदगी से विचार और समीक्षा करेगी। यह कदम बिहार की राजनीतिक विरासत को सहेजने की दिशा में एक अच्छी शुरुआत हो सकता है।
बिहार की राजनीति में नाम बदलने की यह चर्चा सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। यह नीतीश कुमार के साए में जेडीयू के भविष्य को सुरक्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकती है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि नीतीश कुमार के बाद भी, उनकी नीतियां और उनका नाम ही इस दल की पहचान बने रहेंगे। अब देखना यह है कि बयानों के इस दौर के बाद क्या सच में बिहार के नक्शे और देश की राजनीति में ‘नीतीश’ नाम का एक नया अध्याय आधिकारिक तौर पर जुड़ता है या नहीं।